मुसलमानों की दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार?
देश की आज़ादी को 70 वर्ष बीत गये, लेकिन देश के सामने एक मुद्दा हर बार उठता है- "मुसलमानों का विकास"।
20वीं शताब्दी में अंग्रेजी सरकार ने मुसलमानों को सरकारी सेवा में नियुक्ति दिलाने के लिए बहुत प्रयास किए। हिंदूओं के सरकार विरोधी रूख को देखकर अंग्रजों ने मुसलमानों के प्रति अपनी पुरानी दमन नीति को छोड़कर उन्हें संरक्षण देने की नीति अपना ली थी। 1905 में वायसराय लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन इसी आधार पर किया था कि पूर्वी बंगाल (वर्तमान में बांग्लादेश) मुस्लिम बहुल है और वहां मुस्लिमों को आगे बढने में सहायता मिलेगी। इसके लिए अंग्रेजों ने हिंदूओं की तूलना में मुस्लिमों की योग्यता को भी कम कर दिया। पाकिस्तान के जनक 'मुहम्मद अली ज़िन्ना' ने भी मुसलमानों की प्रगति के लिए ही वकालत की। सर सैयद अहमद खां, अबुल क़लाम आज़ाद, आगा खां, आदि कई मुस्लिम नेताओं ने मुस्लिमों के विकास के लिए महत्वपूर्ण काम किए, लेकिन परिणाम- नील बटे सन्नाटा।
1947 में 'मुहम्मद अली ज़िन्ना' ने मुस्लिमों के विकास के लिए ही धर्म के आधार पर मुस्लिमों के लिए अलग देश की मांग की और वो मांग अंग्रेजों और महात्मा गांधी तथा पं. नेहरू ने पूरा भी किया। मुस्लिमों के विकास के लिए देश का तीन फाड़ किया। लेकिन अफ़सोस कि सरहद के उस पार और इस पार, दोनों जगह मुसलमानों की हालत एक ही है। जहां पाकिस्तान को अपने लोगों के विकास पर ध्यान देने की बजाय अपने आतंकियों को पालने से फुर्सत नहीं है, तो दूसरी तरफ हिंदूस्तान के मुस्लिम अपने पिछड़ेपन के लिए हर सरकार को जिम्मेदार मानते हैं। 70 साल से भी ज्यादे हो गये इस देश को आज़ाद हुए। इन 70 सालों में कई सरकारें आईं और आकर चली गयीं। इन सरकारों ने अपनी सार्वजनिक योजनाओं के अलावा भी मुस्लिमों के उत्थान के लिए अलग से योजनाएं चलाईं, जिससे कि मुस्लिमों की स्थिति बेहतर हो और वो आगे बढें। आजादी के बाद से अबतक मुस्लिमों की स्थिति बद से बद्तर हो चुकी है। सरकारों ने बहुसंख्यक हिंदूओं के कर का पैसा भारत की एकमात्र अल्पसंख्यक कौम मुस्लिमों पर पानी की तरह बहाया गया। लेकिन परिणाम देश के सामने है। आज भी मुसलमान वहीं के वहीं हैं। यदि किसी मुस्लिम से उनके पिछड़ेपन का कारण पूछो तो बिना कुछ सोचे समझे वो सरकारों को ही जिम्मेदार बताएंगे। केंद्र या राज्य सरकारों ने अपने प्रिय वोटबैंक के लिए तरह तरह की नयी योजनाएं बना बनाकर पटका, लेकिन नतीजा- 'ढाक के तीन पात'।
गली गली मदरसे खोले गये, मदरसों को सरकारी अनुदान दिया गया और यहां तक सुविधा दी गयी कि मदरसों की जांच भी नहीं होगी। हज़ यात्रा में सब्सिडियां दी गयीं। मौलवियों और इमामों को हर तरह की ख़ैरात बांटी गयी, जहां चाही वहां मस्जिद खड़ी कर दी, दरगाह बना दी, ये भी सुविधा दी गयी कि दरगाहों/मस्जिदों में जो भी चढावा आयेगा, उस पर कोई सरकार का नियंत्रण नहीं होगा, फिर भी इस समुदाय की हालत जस की तस रही। मुसलमानों के कई मामलों के लिए संविधान को ताक़ पर रखकर उनके लिए 1973 में 'आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड' नामक गैर-सरकारी संगठन बनाया गया। मंदिरों के चाढावों को सरकारों ने अपने अधीन कर लिया, लेकिन मुस्लिमों के लिए बने गैर सरकारी संगठनों, मस्जिदों, मदरसों की कोई जांच नहीं।
फिर भी मुस्लिमों का विकास नहीं हुआ।
वर्तमान की मोदी सरकार ने सिर्फ मुस्लिम लड़कियों के लिए ₹51000 का शादी का शगुन देने का फैसला किया, जो मुस्लिम लड़कियां स्नातक की पढाई पूरी कर लेंगी। हर सरकारों ने विशेष रूप से मुसलमानों के लिए योजना बनाई, लेकिन विशेष रूप से सिखों, जैनों, ईसाईयों, बौध्दों, पारसियों, आदि के लिए अलग से योजना नहीं बनाई गयी।
फिर भी इनकी दुर्दशा के लिए सरकारें ही जिम्मेदार होती हैं।
इतना ही नहीं, कुछ मुस्लिम तो अपनी बर्बादी के लिए हिंदूओं को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। कितना हास्यस्पद 2% से भी कम सिखों, जैनों, बौध्दों, ईसाईयों, पारसियों को हम आगे बढने से नहीं रोक पाए, लेकिन 20% मुस्लिमों को हमने आगे बढने से रोक दिया।
इस राष्ट्रीय चुनौती का समधान "आज़म खान" (पूर्व मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार) ने सुझाया है कि सरकार को ताजमहल को मुस्लिम वक्फ बोर्ड को सौंप देना चाहिए, ताकि इससे होने वाले आय को मुसलमानों के विकास में लगाया जा सके। लेकिन प्रश्न ये है कि अगर इससे भी विकास न हुआ तो..... तब आगे ये लाल क़िला, क़ुतुब मीनार, बुलन्द दरवाजा, भूल भूलैया, आदि सबकी मांग करेंगे कि ये सबका हक़ हमें दे दो, तब हम विकास कर लेंगे।
मासूम मुसलमान बच्चे बम फोड़कर बच निकलें, इसके लिए विभिन्न तरह के आतंक निरोधी कानून (टाडा और पोटा) समाप्त कर दिए गये।
लेकिन स्थिति वही रही।
अब खबरदार जो इनकी पुरानी 'कु'रीतियों पर जो किसी ने ऊंगली उठाई तो।
अपनी धार्मिक रीतियों के अनुसार वे चार शादी चौबीस बच्चे पैदा कर सकते हैं, भले उन्हें खिलाने के लिए दो वक्त की रोटी पैदा न हो सके। वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में भले न भेजें, लेकिन मदरसों में जरूर भेजेंगे। वे सामान्य परिवार से 2.5 गुना बड़ा परिवार बना सकते हैं, फिर चाहे उनके बच्चों की फौज सड़क किनारे पंचर बनाए या मिस्त्री की दुकानों पर गालियां खाए।
अपनी लड़कियों को 15 वर्ष की उम्र में ही बालिग मान लेते हैं। उन्हें उच्च शिक्षा देने की बजाय उन्हें उनके प्रथम मास से ही बालिग मानकर निकाह कर दें। भले ही वो बच्चियां 25 वर्ष की उम्र तक आठ बच्चियों की अम्मी बन जाएं।
लेकिन उनकी परंपराओं पर ऊंगली न उठाएं।
उनके अविकसित होने का दोष सिर्फ हिंदूओं पर मढ दें।
इनकी समस्याओं के लिए 'अरिन्दम चौधरी' की कही एक बात बिल्कुल सटीक बैठती है-
"यदि आपकी समस्या का कोई समाधान नहीं है तो फिर समस्या आप ही हैं"।
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