एक महान क्रांतिकारी, जिसे गुमनाम कर दिया गया- नेताजी।

देश आजाद होने के बाद संसद में कई बार माँग उठती है कि कथित विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए सरकार कोशिश करेे मगर प्रधानमंत्री नेहरूजी इस माँग को प्रायः दस वर्षों तक टालने में सफल रहते हैं। भारत सरकार इस बारे में ताईवान सरकार (फारमोसा का नाम अब ताईवान हो गया है) से भी सम्पर्क नहीं करती।

अन्त में जनप्रतिनिगण जस्टिस राधाविनोद पाल की अध्यक्षता में गैर-सरकारी जाँच आयोग के गठन का निर्णय लेते हैं। तब जाकर नेहरूजी 1956 में भारत सरकार की ओर से जाँच-आयोग के गठन की घोषणा करते हैं।

लोग सोच रहे थे कि जस्टिस राधाविनोद पाल को ही आयोग की अध्यक्षता सौंपी जायेगी। विश्वयुद्ध के बाद जापान के युद्धकालीन प्रधानमंत्री सह युद्धमंत्री जनरल हिदेकी तोजो पर जो युद्धापराध का मुकदमा चला था, उसकी ज्यूरी (वार क्राईम ट्रिब्यूनल) के एक सदस्य थे- जस्टिस पाल। 

मुकदमे के दौरान जस्टिस पाल को जापानी गोपनीय दस्तावेजों के अध्ययन का अवसर मिला था, अतः स्वाभाविक रुप से वे उपयुक्त व्यक्ति थे जाँच-आयोग की अध्यक्षता के लिए मगर नेहरूजी को आयोग की अध्यक्षता के लिए सबसे योग्य व्यक्ति शाहनवाज खान नजर आते हैं।

शाहनवाज खान- उर्फ, लेफ्टिनेण्ट जनरल एस.एन. खान। कुछ याद आया? जी हाँ बॉलीवुडी भांड शाहरूख़ खान की माँ लतीफ़ फातमा का पिता यानि शाहरूख़ खान का नाना तथा आईएनए / आजाद हिन्द फौज का तथाकथित मेजर जनरल शाहनवाज़ खान .

मेजर जनरल शाहनवाज़ खान, आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैन्याधिकारी, जो शुरु में नेताजी के दाहिने हाथ थे, मगर इम्फाल-कोहिमा फ्रण्ट से उनके विश्वासघात की खबर आने के बाद नेताजी ने उन्हें रंगून मुख्यालय वापस बुलाकर उनका कोर्ट-मार्शल करने का आदेश दे दिया था।

उनके बारे में यह भी बताया जाता है कि कि लाल-किले के कोर्ट-मार्शल में उन्होंने खुद यह स्वीकार किया था कि आई.एन.ए./आजाद हिन्द फौज में रहते हुए उन्होंने गुप्त रुप से ब्रिटिश सेना को मदद ही पहुँचाने का काम किया था। यह भी जानकारी मिलती है कि बँटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गये थे, मगर नेहरूजी उन्हें भारत वापस बुलाकर अपने मंत्रीमण्डल में उन्हें सचिव का पद देते हैं।

विमान-दुर्घटना में नेताजी को मृत घोषित कर देने के बाद शाहनवाज खान को नेहरू मंत्रीमण्डल में मंत्री पद (रेल राज्य मंत्री) प्रदान किया जाता है।

1970 में (11 जुलाई) एक दूसरे आयोग का गठन करना पड़ता है। यह इन्दिराजी का समय है। इस आयोग का अध्यक्ष जस्टिस जी.डी. खोसला को बनाया जाता है।

जस्टिस घनश्याम दास खोसला के बारे में तीन तथ्य जानना ही काफी होगा:

1. वे नेहरूजी के मित्र रहे हैं;

2. वे जाँच के दौरान ही श्रीमती इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख रहे थे, और

3. वे नेताजी की मृत्यु की जाँच के साथ-साथ तीन अन्य आयोगों की भी अध्यक्षता कर रहे थे।

       सांसदों के दवाब के चलते आयोग को इस बार ताईवान भेजा जाता है। मगर ताईवान जाकर जस्टिस खोसला किसी भी सरकारी संस्था से सम्पर्क नहीं करते- वे बस हवाई अड्डे तथा शवदाहगृह से घूम आते हैं। कारण यह है कि ताईवान के साथ भारत का कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं है।

       हाँ, कथित विमान-दुर्घटना में जीवित बचे कुछ लोगों का बयान यह आयोग लेता है, मगर पाकिस्तान में बसे मुख्य गवाह कर्नल हबिबुर्रहमान खोसला आयोग से मिलने से इन्कार कर देते हैं। 

       खोसला आयोग की रपट पिछले शाहनवाज आयोग की रपट का सारांश साबित होती है। 

अब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री हैं, दो-दो जाँच आयोगों का हवाला देकर सरकार इस मामले से पीछा छुड़ाना चाह रही थी, मगर न्यायालय के आदेश के बाद सरकार को तीसरे आयोग के गठन को मंजूरी देनी पड़ती है।

इस बार सरकार को मौका न देते हुए आयोग के अध्यक्ष के रुप में (अवकाशप्राप्त) न्यायाधीश मनोज कुमार मुखर्जी की नियुक्ति खुद सर्वोच्च न्यायालय ही कर देता है।

जहाँ तक हो पाता है, कांग्रेसियों की सरकार मुखर्जी आयोग के गठन और उनकी जाँच में रोड़े अटकाने की कोशिश करती है, मगर जस्टिस मुखर्जी जीवट के आदमी साबित होते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी वे जाँच को आगे बढ़ाते रहते हैं।

आयोग सरकार से उन दस्तावेजों (“टॉप सीक्रेट”  पी. एम. ओ. फाईल 2/64/78-पी.एम.) की माँग करता है, जिनके आधार पर 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संसद में बयान दिया था, और जिनके आधार पर कोलकाता उच्च न्यायालय ने तीसरे जाँच-आयोग के गठन का आदेश दिया था। प्रधानमंत्री कार्यालय और गृहमंत्रालय दोनों साफ मुकर जाते हैं- ऐसे कोई दस्तावेज नहीं हैं,,होंगे भी तो हवा में गायब हो गये!    

आप यकीन नहीं करेंगे कि जो दस्तावेज खोसला आयोग को दिये गये थे, वे दस्तावेज तक मुखर्जी आयोग को देखने नहीं दिये जाते, ‘गोपनीय’ एवं ‘अति गोपनीय’ दस्तावेजों की बात तो छोड़ ही दीजिये। प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, सभी जगह से नौकरशाहों का यही एक जवाब-

“भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को आयोग को नहीं दिखाने का“प्रिविलेज” उन्हें प्राप्त है!”

भारत सरकार के रवैये के विपरीत ताईवान सरकार मुखर्जी आयोग द्वारा माँगे गये एक-एक दस्तावेज को आयोग के सामने प्रस्तुत करती है। चूँकि ताईवान के साथ भारत के कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं हैं, इसलिए भारत सरकार किसी प्रकार का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दवाब ताईवान सरकार पर नहीं डाल पाती है।

हाँ, रूस के मामले में ऐसा नहीं है। भारत का रूस के साथ गहरा सम्बन्ध है, अतः रूस सरकार का स्पष्ट मत है कि जब तक भारत सरकार आधिकारिक रुप से अनुरोध नहीं भेजती, वह आयोग को न तो नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेज देखने दे सकती है और न ही कुजनेत्स, क्लाश्निकोव- जैसे महत्वपूर्ण गवाहों का साक्षात्कार लेने दे सकती है। आप अनुमान लगा सकते हैं- आयोग रूस से खाली हाथ लौटता है।

2005 में दिल्ली में फिर काँग्रेस की सरकार बनती है। यह सरकार मई में जाँच आयोग को छह महीनों का विस्तार देती है।

8 नवम्बर को आयोग अपनी रपट सरकार को सौंप देता है। सरकार इस पर कुण्डली मारकर बैठ जाती है। दवाब पड़ने पर 18 मई 2006 को रपट को संसद के पटल पर रखा जाता है।

मुखर्जी आयोग को पाँच विन्दुओं पर जाँच करना था:
1. नेताजी जीवित हैं या मृत?
2. अगर वे जीवित नहीं हैं, तो क्या उनकी मृत्यु विमान-दुर्घटना में हुई, जैसा कि बताया जाता है?
3. क्या जापान के रेन्कोजी मन्दिर में रखा अस्थिभस्म नेताजी का है?
4. क्या उनकी मृत्यु कहीं और, किसी और तरीके से हुई, अगर ऐसा है, तो कब और कैसे?
5. अगर वे जीवित हैं, तो अब वे कहाँ हैं?

आयोग का निष्कर्ष कहता है कि-

1. नेताजी अब जीवित नहीं हैं। 

2. किसी विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु नहीं हुई है।

3. रेन्कोजी मन्दिर (टोक्यो) में रखा अस्थिभस्म नेताजी का नहीं है।

4. उनकी मृत्यु कैसे और कहाँ हुई- इसका जवाब आयोग नहीं ढूँढ़ पाया।

       स्वाभाविक रुप से सरकार इस रिपोर्ट को खारिज कर देती है। अगर हम यहाँ यह अनुमान लगायें कि कांग्रेस की भारत सरकार ने “अराजकता”  या  “राजनीतिक अस्थिरता”  फैलने की बात कहकर मुखर्जी आयोग को ‘चौथे’ विन्दु पर ज्यादा आगे न बढ़ने का अनुरोध किया होगा, तो क्या हम बहुत गलत होंगे?  

कृपया निम्न तथ्यों को बहुत ही ध्यान से तथा मनन करते हुए पढ़िये:-

1. 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल कर रख देती है।

2. 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में ‘विजयी’ देश के रुप में उभरता है।

3. ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है।

4. इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है।

5. जाहिर है, इतना खून-पसीना ब्रिटेन ‘भारत को आजाद करने’ के लिए तो नहीं ही बहा रहा है। अर्थात् उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा है।

6. फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार होता है कि ब्रिटेन हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लेता है?

हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते- क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आये हैं- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल। इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते।

यहाँ हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस ‘अहिंसक कांग्रेसी चमत्कार’ का पता लगायेंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की इच्छा रखने वाले अँग्रेजों को जल्दीबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा।

प्रसंगवश- जरा अँग्रेजों द्वारा भारत में किये गये ‘निर्माणों’ पर नजर डालें- दिल्ली के ‘संसद भवन’ से लेकर अण्डमान के ‘सेल्यूलर जेल’ तक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने एवं इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है!

INA अधिकारियों के लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की पूरी सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है।इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं कि फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये, बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादूरी के साथ“भारत माँ की आजादी के लिए” लड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर एवं बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो “महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिए” लड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे! दोनों ही सही नहीं हो सकते।

सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रुप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रुप में फूटकर बाहर आने लगा।

फरवरी 1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एक हड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है। कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है।

यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध “राजभक्ति” की नींव को भी हिला कर रख देता है जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह “राजभक्ति” ही है!

बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी, जब (मार्च’44 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आह्वान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित हो जायें और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें।

भारत का प्रभावशाली राजनीतिक दल काँग्रेस पार्टी गाँधीजी की ‘अहिंसा’ के रास्ते आजादी पाने का हिमायती था, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरु नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर काँग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी! ऐसी कल्पना नेताजी-जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। …जबकि दुनिया जानती थी कि इन “भारतीय जवानों” की “राजभक्ति” के बल पर ही अँग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं।) 

” ★ एक और मुख्य कारण के रुप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाय कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की ‘कठपुतली सेना’ (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्द तथा कार्टून का इस्तेमाल वे अपनी पत्रिकाओं में करते थे। ”

जो आन्दोलन एवं बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस “राजभक्ति” के बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस “राजभक्ति” का क्षरण शुरू हो गया है… और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है।

वर्ना जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जायेगा… और भारत में रह रहे सारे अँग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिये जायेंगे।

लन्दन में ‘सत्ता-हस्तांतरण’ की योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक तथा दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अँग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी अभी कुछ समय पहले तक तक वेतन ले रहा था, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता था!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाय। 

बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि ‘गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों से’ हमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना कि ‘नेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारण’ हमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले, सबसे पहले, माईकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलन:

“भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसाकि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दिखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों पर चलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।”

अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं।

प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो विन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा है-

1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और

2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके। 

लालकिले में कोर्ट मार्शल के बहाने आजाद हिन्द फौज में शामिल सेना के भारतीय जवानों को बगावत के बदले ‘सबक’ सिखाने का दाँव ब्रिटिश सेना को उल्टा पड़ जाता है। भारतीय जवानों के बीच ब्रिटिश अधिकारियों का रुतबा (आजाद हिन्द सैनिकों की इस रिहाई के बाद) समाप्त हो जाता है। …अब इस सेना के भरोसे भारत-जैसे विशाल देश पर शासन करना अँग्रेजों के लिए सम्भव नहीं है।  

इन परिस्थितियों में लन्दन में भारत पर कुछ फैसले लिये जाते हैं, जिनमें से एक है- बर्मा के गवर्नर जेनरल लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाना (वावेल के स्थान पर)। माउण्टबेटन काँग्रेस अध्यक्ष नेहरूजी को ‘भावी प्रधानमंत्री’ के रूप में सिंगापुर बुलाते हैं और सूचित करते हैं कि नेहरूजी को ब्रिटेन की कुछ शर्तों का पालन करना होगा। उन शर्तों में से एक शर्त यह भी है कि आजाद हिन्द सैनिकों को आजाद भारत की सेना में शामिल नहीं किया जायेगा। (अगर नेताजी कहीं लौट आते हैं, तो ये सैनिक और इनके प्रभाव से अन्य सैनिक, भारत की सत्ता नेताजी के हाथों में सौंप देंगे!) इसके अलावे माउण्टबेटन नेहरूजी को आगाह करते हैं कि (लालकिले के कोर्ट-मार्शल में जो हुआ, सो हुआ) अब वे आजाद हिन्द फौज तथा नेताजी का गुणगाण न करें। बेशक, नेहरूजी को सारी शर्तें और सलाह मंजूर हैl

हालाँकि बाद में इन सैनिकों को होमगार्ड, पुलिस, अर्द्धसैन्य बल में शामिल होने की छूट दी जाती है। मगर ज्यादातर गरीबी का जीवन बिताते हुए किसी प्रकार गुजर-बसर करते हैं। हाँ, मो. जिन्ना पाकिस्तान गये आजाद हिन्द सैनिकों को पूरे सम्मान के साथ नियमित पाकिस्तानी सेना में शामिल करते हैं।
***
यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं:

“… उनसे मेरी उन वास्तविक विन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का “भारत छोड़ो” आन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, “न्यू-न-त-म / M i ni mu u m ”

(श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑव बेंगाल’ के प्रकाशक को लिखा था।)

***

निष्कर्ष के रुप में यह कहा जा सकता है कि:-

1. अँग्रेजों के भारत छोड़ने के हालाँकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के सिर्फ अँग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था।

2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे- नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति।

3. अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गाँधीजी या काँग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान बहुत ही कम रहा।

उसी नेवी की बगावत के सिपाहियों को गाँधी ने ‘सिपाही नहीं गुण्डे’ कहा था और अँग्रेजों ने उस विद्रोह को बेरहमी से कुचलने में कामयाबी पाई थी. जिस पर बगावती सिपाहियों को गोलियों से भून दिए जाने पर प्रसिद्ध इन्क्लाबी शायर ‘साहिर लुधियानवी’ ने लिखा था ………

ए रहबर मुल्को कौम बता, ये किसका लहू है कौन मरा
क्या कौमो वतन की जय गाकर मरते हुए राही गुण्डे थे..
जो बागे गुलामी सह न सके वो मुजरिम-ए-शाही गुण्डे थे
जो देश का परचम ले के उठे वो शोख सिपाही गुण्डे थे
जम्हूर से अब नज़रें न चुरा अय रहबर मुल्को कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा ………

बरहाल हम नेताजी पर लौटते हुऐ आखिरकार नेताजी का क्या हुआ पर ध्यान केंद्रित करते हैम स्टालिन के समय में सोवियत संघ में नेताजी के ‘जिक्र’ पर प्रतिबन्ध था। वैसे भी, उन दिनों के सोवियत संघ के ‘लोहे के पर्दों’ (Iron Curtains) के बारे में भला कौन नहीं जानता!

हमने अब तक यह जान लिया है कि नेताजी 23 अगस्त 1945 से सोवियत संघ में थे और कुछ वर्षों तक याकुतस्क में रहे। इसके बाद क्या हुआ, यह वाकई एक रहस्य है।

सबसे पहले दो मुख्य सम्भावना:

1. नेताजी सोवियत संघ से भारत नहीं लौटे, और

2. नेताजी सोवियत संघ से भारत लौट आये।

एक तथ्य है, जिसे उपर्युक्त विकल्पों के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है। इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। यह तथ्य है- नेताजी ने ‘खाली हाथ’ सोवियत संघ में प्रवेश नहीं किया था, बल्कि उनके साथ ‘बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और सोने के आभूषण’ थे। (नेहरूजी को सन्देश भेजने वाले सूत्र के कथन को याद कीजिये- ‘…उनके साथ बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और गहने थे…’।) जिक्र करना प्रासंगिक होगा कि ‘आजाद हिन्द बैंक’ का सोना अब तक ‘अप्राप्य’ है। अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि उस खजाने का एक हिस्सा नेताजी के साथ ही सोवियत संघ तक गया होगा।

इस सोने या खजाने के बदले में- अनुमान लगाया जा सकता है कि- सोवियत संघ में न तो नेताजी हत्या हुई होगी; न उन्हें ब्रिटेन के हाथों सौंपा गया होगा, और न ही उन्होंने अपना सारा जीवन साइबेरिया की जेल में बिताया होगा।उन्होंने भारत आना चाहा होगा और रूसियों को इसपर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

नेताजी के बारबार रूसियों की तरफ झुकाव के बहुत ही स्पष्ट ऐतिहासिक कारण थे, 5 अगस्त सन 1919 को लाल सेना के कमांडर लेव त्रोत्सकी ने रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्त्व के सामने एक गुप्त नोट विचार के लिये प्रस्तुत किया, इस नोट में लाल सेना द्वारा केन्द्रीय एशिया और अफगानिस्तान से होते हुए ब्रिटिश भारत पर हमला करने की योजना थी ! त्रोत्सकी की योजना उराल प्रांत या केन्द्रीय एशिया में एक क्रांतिकारी अकादमी और एशियाई क्रान्ति का राजनीतिक और सैन्य मुख्यालय बनाने की थी , उन्हें पूरा विश्वास था कि भारत में लगी क्रान्ति की आग की लपटें यूरोप की राजधानियों को अवश्य ही अपनी चपेट में ले लेंगीं , लन्दन और पेरिस की क्रान्ति का रास्ता अफगानिस्तान, पंजाब और बंगाल से होकर गुज़रता है- ऐसा इस जोशीले क्रांतिकारी का मानना था,, त्रोत्सकी का सुझाव था कि 30-40 हज़ार घुड़सवारों की एक विशेष सेना बनाई जाए, उन्हें पूरा यकीन था कि जैसे जैसे यह सेना आगे बढ़ेगी, वैसे वैसे नए अफगान और भारतीय योद्धा इससे जुड़ते जाएंगे, क्रान्ति की पताका गंगा के तटों पर लहराएगी और यह भारतीय अंतर्राष्ट्रीय सेना अंग्रेजों के छक्के छुडा देगी तथा भारत एक स्वतंत्र सोशलिस्ट राष्ट्र के रूप में दुनिया के नक़्शे पर उभरेगा फिर क्रान्ति की यह लहर अफगानिस्तान से होती हुई ईरान और एशिया के अन्य राष्ट्रों तक फैल जाएगी, त्रोत्सकी ने अपने नोट में लिखा था की उनकी यह योजना मात्र एक प्रारम्भिक ड्राफ्ट है और आगे इसपर विस्तृत काम की आवश्यकता है..!!

ब्रिटिश राज से भारत को मुक्ति दिलाने के लिए रूसी सेना भेजने की यह योजना त्रोत्सकी की पहली न थी, रूसी क्रान्ति से दो सौ वर्ष पहले यह योजना रूसी सम्राट पावेल प्रथम की भी थी उन्होंने वर्ष 1801 में अपनी सेना को भारत पर कूच करने की तैयारी करने का आदेश दिया था घुड़सवारों का काफिला तब भी उसी मार्ग से गुजरने वाला था, जिस के बारे में दो शताब्दी बाद त्रोत्सकी ने लिखा था यानी केन्द्रीय एशिया और अफगानिस्तान से होते हुए भारत का सफ़र लेकिन तब यह रूसी घुड़सवार सेना सीमा तक पार नहीं कर पाई थी कि महल में तख्तापलट हो गया और पावेल प्रथम की हत्या कर दी गयी।
राज सिंहासन पावेल के उत्तराधिकारी अलेक्सान्दर प्रथम को प्राप्त हुआ और उन्होंने भारत की और रवाना सेना को वापस लौटने का आदेश दे दिया, ब्रिटिश सरकार ने सम्राट के इस आदेश से राहत की सांस ली थी और शायद यह ऐतिहासिक तथ्य नेताजी के संज्ञेय थे।

रूस और ब्रिटेन के बीच सम्बन्ध उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में तनावग्रस्त हो गए उस वक़्त रूसी सैन्य विशेषज्ञों ने फिर ब्रिटेन को चोट पहुंचाने के उद्देश्य से भारत पर नज़रें टिकाईं, क्योंकि महारानी विक्टोरिया भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का बेहतरीन नगीना मानती थीं लेकिन तब यह योजना मात्र चर्चा के एक विषय में ही सिमट कर रह गयी थी, हालांकि इस चर्चा ने भी लन्दन को काफी परेशान किया था, अंग्रेजों को इस बात का पूरा इल्म था कि अगर भारत के लोगों ने रूसियों के साथ हाथ मिला लिए तो उन्हें अपनी प्रभुत्ता से हाथ गंवाना पडेगा और अपने मुकुट के सबसे कीमती नगीने से बिदा होना पडेगा..जो कि नेताजी का भी लक्ष्य था और उनके समय के कई साम्यवादी क्रांतिकारियों का भी जैसे भगतसिंह, आजाद, अबनि मुखर्जी, रासबिहारी बोस आदि

इसी कारण बिना धार्मिक, जाति व क्षेत्रीयता विभेद के वास्तविकता में अखंड भारत की संरचना हेतु फॉरवर्ड ब्लॉक’ के मियाँ अकबर शाह से लेकर ‘इण्डियन लीजन’ के आबिद हसन तक, और फिर ‘आजाद हिन्द’ के हबिबुर्रहमान तक, नेताजी के सैकड़ों मित्र एवं सहयोगी मुसलमान थे।
यहाँ इस तथ्य का जिक्र सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि सहज ही अनुमान लगाया जा सके कि …अगर नेताजी ‘दिल्ली पहुँच’ गये होते, तो आज हमारा देश तीन टुकड़ों में बँटा हुआ नहीं होता!

दूसरी बात, अँग्रेजों के तलवे सहलाने वाले कांग्रेसी व कम्युनिस्ट जो बाद में एम.पी., एम.एल.ए. बनने लगे, यह नेताजी नहीं होने देते! (सत्ता सम्भालने के बाद नेताजी के पहले कामों में से एक होता इन गद्दारों को ‘काला पानी’ भेजना।)
सेना और पुलिस के अधिकारियों का “ब्रिटिश हैंगओवर” वे एक झटके में उतार देते बेशक, जो अधिकारी राजी नहीं होते, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता। (रात जमकर शराब पीने के बाद सुबह नींद से उठने पर भी जो नशा रहता है, उसे ‘हैंग-ओवर’ कहते हैं। यहाँ ब्रिटिश हैंगओवर से तात्पर्य है- खुद को अँग्रेज तथा आम लोगों/सिपाहियों को भारतीय समझने की मानसिकता।)

नेताजी के मुकाबले नेहरूजी का रवैया देखिये-

1948 में देश में पहला घोटाला होता है- ‘जीप घोटाला’।
घोटाला करने वाले हैं- ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त श्री वी.के. कृष्ण मेनन, जो नेहरूजी के दाहिने हाथ हैं। सेना के लिए 1500 जीपों की खरीद के लिए 1 लाख 72 हजार पाउण्ड धनराशि का अग्रिम भुगतान विवादास्पद कम्पनी को कर दिया जाता है। जो 155 जीपें पहली खेप में आती हैं, वे चलने लायक भी नहीं हैं। 1949 में जाँच होती है, सरसरी तौर पर मेनन को दोषी ठहराया जाता है; मगर नेहरूजी 30 सितम्बर 1955 को मामले को बन्द करवा देते हैं। इतना ही नहीं, 3 फरवरी 1956 को मेनन को वे केन्द्रीय मंत्री बना देते हैं। सेना के लिए जीप खरीद घोटाला करने वाले को रक्षामंत्री बना दिया जाता है!

हमें तो ब्रिटिश गुलामी के पट्टे के रुप में ‘राष्ट्रमण्डल- कॉमनवेल्थ’ की सदस्यता की माला को भारत माँ के गले में डले हुए देखना है…काँग्रेस ने आजादी “बिना खड्ग बिना ढाल” के ही तो दिलवाई है,,जो भी हो। देश आजाद हो गया है,ब्रिटिश गुलामी के पट्टे को ढोते, विदेशी देशों से संबध बचाने को अब काँग्रेस के साथ साथ नवबावले नवराष्ट्रवादी आ गये हैं।

बिना ‘स्वतंत्रता के घोषणापत्र’ से जरूरी दस्तावेज़ के होते हुऐ भी काँग्रेस की नजर में 1947 से भारतदेश आजाद है….???

अतः यह हमारे देश के साथ नियति का छल ही माना जायेगा कि नेताजी दिल्ली नहीं पहुँच पाते हैं और हमारा देश एक खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली देश नहीं बन पाता है… इसके बदले नेहरूजी को 17 वर्षों तक देश पर शासन करने का मौका मिलता है, जो देश के पहले घोटाले के दोषी को पुरस्कृत कर एक गलत परम्परा की शुरुआत कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप 21वीं सदी के दूसरे दशक की उदय बेला में आज देश एक ‘घोटालेबाज’ देश के रुप में विश्व में कुप्रसिद्धि पा रहा है… !!

जुलाई 1940 में अपने साप्ताहिक ‘हरिजन सेवक’ के दूसरे अंक में गाँधीजी क्या लिखते हैं:

“वर्धा से लौटते हुए नागपुर स्टेशन पर एक नवयुवक ने यह सवाल पूछा कि कार्य-समिति ने सुभाष बाबू की गिरफ्तारी की तरफ क्यों कुछ ध्यान नहीं दिया? नवयुवक का प्रश्न मुझे ठीक लगा। मैंने उसे ध्यान में रख लिया।सुभाष बाबू दो बार काँग्रेस के राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं। अपनी जिन्दगी में उन्होंने भारी आत्मबलिदान किया है। वह एक जन्मजात नेता हैं। मगर सिर्फ इस वजह से कि उनमें ये सब गुण हैं, यह साबित नहीं होता कि उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ कार्य-समिति अपनी आवाज ऊँची करे।”

***

अनुमान लगाया जा सकता है कि गाँधीजी अच्छी तरह जानते होंगे कि बात चाहे देशभक्ति की हो या आत्मबलिदान की; प्रतिभा की हो या नेतृत्व की क्षमता की, हर मामले में सुभाष नेहरू से बीस पड़ता है। वे यह भी जानते होंगे कि आजादी के बाद नेहरू के मुकाबले सुभाष ही देश को बेहतर शासन-प्रशासन दे सकता है।

इसके बावजूद गाँधीजी नेताजी के प्रति सौतेला-सा भाव रखते हैं और नेहरूजी को (1941 में) अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं।

ऐसा वे सिर्फ ‘वैचारिक मतभेद’ के कारण करते हैं। गाँधीजी जहाँ अँग्रेजों का हृदय-परिवर्तन करना चाहते थे, वहीं नेताजी अँग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाना चाहते थे। अन्तिम लक्ष्य दोनों का एक ही था- आजादी या स्वराज!

आजादी या स्वराज के अन्तिम लक्ष्य, यानि “साध्य” को पाने के लिए नेताजी किसी भी “साधन” को अपनाने के तैयार थे। उनके अनुसार, देश की आजादी के लिए अगर शैतान से भी हाथ मिलाना पड़े, तो वे मिलायेंगे।(सन्दर्भ: हिटलर-मुसोलिनी से मैत्री।) इसके मुकाबले गाँधीजी “साधन” की पवित्रता पर जोर देते थे। उनका स्पष्ट कहना था: “मैं अपने देश या अपने धर्म तक के उद्धार के लिए सत्य और अहिंसा की बलि नहीं दूँगा। वैसे, इनकी बलि देकर देश या धर्म का उद्धार किया भी नहीं जा सकता।”

इस ‘वैचारिक मतभेद’ के बावजूद नेताजी गाँधीजी के प्रति ‘पिता’-जैसा सम्मान मन में बनाये रखते हैं। वे गाँधीजी को “राष्ट्रपिता” कहकर सम्बोधित करते हैं- आजाद हिन्द रेडियो पर। नेताजी यह भी कहते हैं कि एकबार देश आजाद हो जाय, फिर अहिंसा की नीति पर हम चलेंगे। मगर गाँधीजी इस ‘वैचारिक मतभेद’ के चलते नेताजी के प्रति पुत्र वाला स्नेह दिखाने से शायद चूक गये- कम-से-कम “वक्त पर” तो चूक ही गये! (1944 के इम्फाल युद्ध के समय नेताजी बहुत ही नाजुक स्थिति में थे- मगर किसी कांग्रेसी भारतीय नेता ने उनका समर्थन नहीं किया…)

देखा जाय, तो ‘स्वतंत्र’ भारत की बदनियति तय करने में गाँधीजी के तीन फैसले अहम भूमिका निभाते हैं:

1. 1939 में नेताजी को काँग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए वे मजबूर करते हैं,

2. 1944 में इम्फाल-कोहिमा युद्ध के दौरान नेताजी के समर्थन में जनता को आन्दोलित होने का आह्वान वे नहीं करते, और-

3. 1946 में काँग्रेस के अध्यक्ष पद पर वे सरदार पटेल के स्थान पर नेहरूजी को बैठाते हैं।

सन् 1946 में जो काँग्रेस का अध्यक्ष बनेगा, वही अगले साल स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा- यह तय है। इसलिए इस बार अध्यक्ष चुनने से पहले काँग्रेस की 15 प्रान्तीय समितियों से प्रस्ताव मँगवाये जाते हैं। उम्मीदवार के रूप में एक तरफ नेहरूजी का करिश्माई व्यक्तित्व है, तो दूसरी तरफ सरदार पटेल का कर्मठ व्यक्तित्व। गाँधीजी पाँच साल पहले ही दोनों में से नेहरूजी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं। इसके बावजूद परिपक्वता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए 15 में से 12 प्रान्तीय समितियाँ सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित करती हैं। केन्द्रीय समिति की बैठक में गाँधीजी नेहरूजी से पूछते हैं- ‘दूसरा’ स्थान स्वीकार है? मारे शर्म और क्रोध के नेहरूजी का चेहरा तमतमा कर लाल हो जाता है। अब गाँधीजी यही सवाल सरदार पटेल से करते हैं- उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। …नेहरूजी अध्यक्ष बनते हैं, …एक तरफ राजभवन से (जाने वाले) वायसराय वावेल और दूसरी तरफ सिंगापुर से (आने वाले) वायसराय माउण्टबेटन उन्हें आमंत्रित करते हैं, …’स्वतंत्र’ भारत की बदनियति तय हो जाती है… ।)

क्या यहां ऐसा नहीं लगता कि इस आधुनिक महाभारत में गाँधीजी श्रीकृष्ण, नेहरूजी अर्जुन और नेताजी कर्ण की भूमिका में हैं?

(प्रसंगवश, यह स्पष्ट कर दिया जाय कि महाभारत में “नायक” की भूमिका दो ने ही अदा की थी- एक कर्ण और दूसरे अभिमन्यु ने, अर्जुन का ऐसा कोई कार्य नहीं है इस युद्ध में कि उसे “नायक” माना जाय। वह “विजयी” बना- वह भी भगवान “श्रीकृष्ण” के कारण!)

विश्वयुद्ध की परिस्थितियाँ नेताजी को दुर्योधन-दुःशासन रुपी हिटलर-मुसोलिनी का मित्र बना देती है। हालाँकि कुछ फर्क भी हैं दोनों महाभारत में- जैसे, यहाँ शकुनी रुपी माउण्टबेटन अर्जुन को बुद्धी देते नजर आ रहे हैं! ….महाभारत की कुन्ती तो फिर भी कर्ण को अपना बेटा स्वीकार कर लेती है, मगर यहाँ कुन्ती रुपी काँग्रेस अब तक अपने ‘अधिवेशनों’ में नेताजी की तस्वीर नहीं लगाती- जबकि नेताजी दो बार काँग्रेस के अध्यक्ष चुने जा चुके थे !

नेहरूजी के प्रति गाँधीजी की आसक्ति आजादी के बाद देश के कोई काम नहीं आती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरूजी गाँधीजी के एक भी सिद्धान्त को नहीं अपनाते हैं। कृषि को नजरअन्दाज कर उद्योग-धन्धों में पैसा खर्च किया जाता है; कुटीर एवं लघु उद्योगों के बजाय मशीनीकरण का जाल फैलाया जाता है; स्थानीय स्तर के शासन-प्रशासन को मजबूत करने के बजाय सत्ता का भारी केन्द्रीकरण किया जाता है; जनता में ‘आधा पेट खाकर भी देश का पुनर्निर्माण करेंगे’- जैसी भावना भरने के बजाय ‘कर्ज लेकर घी पीने’ की मानसिकता तैयार की जाती है (जरा सोचिये, जब देश आजाद हुआ, तब एक डॉलर एक रूपये में मिलता था- विश्व बैंक से कर्ज पाने के लिए रूपये का पहली बार अवमूल्यन किया गया- तब से अब तक यह प्रक्रिया थम नहीं पायी है- ऊपर से, हम ऋण-चक्र में फँस चुके हैं!);
काँग्रेस द्वारा कभी भी पुलिस एवं प्रशासन के लोगों को यह समझाने की कोशिश नहीं की जाती है कि देश के नागरिक अब उन्हीं के भाई-बन्धु हैं- ‘शासित’ नहीं; …कहने का तात्पर्य, लगभग हर काम गाँधीजी के सिद्धान्तों के उलट किया जाता है और यही काँग्रेस गाँधीजी को अपनी संपत्ति / थाती बताती है ..??

गाँधीजी जहाँ आजाद भारत की नींव को मजबूत बनाना चाहते थे, वहीं विलासी गैरजिम्मेदार नेहरूजी बिना नींव के ही आलीशान गुम्बद बनाने में जुट जाते हैं और यही नीति काँग्रेस ने आजतक अपना रखी है।
1922 में असहयोग आन्दोलन को जारी रखने पर ही यदि आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गाँधीजी को जाता। मगर “चौरी-चौरा” में ‘हिंसा’ होते ही उन्होंने अपना ‘अहिंसात्मक’ आन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अँग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे! दरअसल गाँधीजी ‘सिद्धान्त’ व ‘व्यवहार’ में अन्तर नहीं रखने वाले महापुरूष हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था- कि गाँधीजी ‘स्वयं अपने आप को’ इस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते।
“” मगर यहाँ ‘अहिंसा का सिद्धान्त’ भारी पड़ जाता है- ‘देश की आजादी’ पर।””

वैसे भी 1938 में गाँधीजी नेताजी को काँग्रेस का अध्यक्ष मनोनीत करते हैं क्योंकि 1937 में नेहरूजी अध्यक्ष थे, और अब 1939 में किसी और की बारी होनी है पर नेताजी चाहते हैं कि प्रगतिशील विचारों वाला कोई व्यक्ति ही अगला अध्यक्ष बने, मगर ऐसा नहीं होते देख वे दुबारा अध्यक्ष बनना चाहते हैं। जबकि काँग्रेस की यह परम्परा बन गयी है कि गाँधीजी द्वारा मनोनीत व्यक्ति ही अध्यक्ष बनेगा। नेताजी इस परम्परा के खिलाफ चले जाते हैं और नौबत चुनाव की आ जाती है।

आश्चर्यजनक रुप से नेताजी (गाँधीजी द्वारा मनोनीत पट्टाभि सीतारामैया को हराकर) दुबारा काँग्रेस के अध्यक्ष चुन लिये जाते हैं। बाद में गाँधीजी नेताजी के साथ ‘असहयोग’ का रवैया अपना लेते हैं। उनके कहने पर महासमिती के 14 में से 12 सदस्य इस्तीफा दे देते हैं, सिर्फ एक ही सदस्य (मनु भाई भिमानी) नेताजी के साथ रहते हैं; जबकि नेहरूजी स्वाभाविक जलनवश तटस्थता की नीति अपनाते हैं,,

भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगॉ बिना काँग्रेस से परामर्श किये भारत को भी युद्धरत देश घोषित कर देते हैं। लाचार काँग्रेसी नेतागण अब ब्रिटेन को युद्ध में पूर्ण समर्थन देने को राजी हो जाते हैं और बदले में युद्ध के बाद आजादी का वायदा माँगते हैं। ब्रिटिश सरकार इस माँग को ठुकरा देती है।

इधर नेताजी का स्पष्ट मत है कि आजादी भीख माँगकर नहीं लेनी चाहिए। इसकी कीमत ऊँची होती है और कीमत चुकाकर ही इसे हासिल करना चाहिए! उनकी नजर में यह विश्वयुद्ध भारत के लिए एक सुनहरा मौका है- और भारत को ब्रिटेन के शत्रु देशों से हाथ मिलाकर आजादी के लिए“सैन्य” अभियान चलाना चाहिए।

इस ‘हिंसा’ भरे प्रस्ताव पर गाँधीजी तथा अन्य नेताओं के साथ नेताजी के मतभेद बढ़ जाते हैं। गाँधीजी स्पष्ट कर देते हैं कि सुभाष, तुम अपना रास्ता अलग चुन लो।

नेताजी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के माध्यम से (बेशक गुप्त रुप से) स्तालिन को भारत की आजादी में मदद के लिए सन्देश भेजते हैं। सम्भवतः स्तालिन नेताजी को मास्को आने का न्यौता भी देते हैं।

ब्रिटिश सरकार को भनक मिलती है- वह नेताजी को जेल में डालने की जुगत में लग जाती है।

नेताजी द्वारा ‘हॉलवेल स्मारक’* तोड़ने की घोषणा के बाद सरकार को मौका मिल जाता है और भारत सुरक्षा कानून (धारा- 129) (Defence of India Act (Article- 129)) के तहत 2 जुलाई 1940 को नेताजी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता है। इस कानून के तहत सुनवाई की गुंजाईश नहीं है।

नेताजी समझ जाते हैं कि विश्वयुद्ध समाप्त होने तक सरकार उसे जेल में ही रखने का इरादा रखती है।

( ‘हॉलवेल स्मारक’: 19 जून 1756 को सिराजुद्दुला ने कोलकाता फोर्ट विलियम पर कब्जा कर लिया था। सिराज के सैनिकों को बदनाम करने के लिए जॉन हॉलवेल ने यह कथा गढ़ी थी कि 146 अँग्रेजों एवं ऐंग्लो इण्डियन को किले के गार्डरूम में बन्द कर दिया गया था, जिससे 123 लोग दम घुटने से मर गये। बाद में अँग्रेजों ने- भारतीयों को क्रूर साबित करने के लिए- इस गार्डरूम को स्मारक बना दिया था। )

23 अगस्त 1945 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय के सर आर.एफ. मुडि ‘नेताजी से कैसे निपटा जाय’ (‘How to deal with Bose’)- विषय पर एक रपट तैयार करते हैं। (अत्यन्त गोपनीय पत्र संख्या- 57, दिनांक- 23 अगस्त 1945।)

रपट सर ई. जेनकिन्स को सम्बोधित है।

(ब्रिटेन में एक बहुत अच्छा कानून है कि एक निश्चित अन्तराल- 30 वर्ष- के बाद ‘गोपनीय’ दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जा सकता है। 1976 में सार्वजनिक हुए दस्तावेजों से ही यह पता चला था कि ब्रिटेन ने तुर्की स्थित अपने एस.ओ.ई. को ‘नेताजी की हत्या’ कर देने का आदेश दिया था, रंगून से सिंगापुर रवाना होने वाली अपनी सेना को ‘नेताजी से मौके पर निपट लेने’ का निर्देश दिया था, और ब्रिटिश जासूसों ने तेहरान और काबुल के सोवियत दूतावासों के हवाले से खबर दी थी कि बोस रशिया में हैं। …अपने देश में ऐसे किसी कानून की अपेक्षा वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत तो नहीं ही की जा सकती।) 

वायसराय इस रपट को ब्रिटेन की संसद में पेश करते हैं।

मंत्रीपरिषद इस रपट पर टिप्पणी लिखता है-

“रूस ने विशेष परिस्थितियों में बोस को स्वीकार कर लिया होगा। अगर ऐसा है, तो हमें उन्हें वापस नहीं माँगना चाहिए।”

(“Russia may accept Bose under special circumstances. If that is the case, we shouldn’t demand him back.”)

एटली इस पर निर्णय लेते हैं-

“उन्हें वहीं रहने दिया जाय, जहाँ वे हैं।”

(“Let him remain where he is now.”)

एटली यह निर्णय अक्तूबर 1945 में लेते हैं। यानि नेताजी अक्तूबर’45 तक तो जीवित थे ही।

नेहरूजी ने एटली को क्या लिखा और किस आधार पर लिखा?

      26 या 27 दिसम्बर 1945 को नेहरूजी आसिफ अली के निवास पर बैठकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेण्ट एटली के नाम एक पत्र टाईप करवाते हैं। पत्र का मजमून है- 

       “श्री क्लिमेण्ट एटली

       ब्रिटिश प्रधानमंत्री

       10 डाउनिंग स्ट्रीट, लन्दन       

प्रिय मि. एटली,

अत्यन्त भरोसेमन्द स्रोत से मुझे पता चला है कि आपके युद्धापराधी सुभाष चन्द्र बोस को स्तालिन द्वारा रूसी क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दे दी गयी है। यह सरासर धोखेबाजी और विश्वासघात है। रूस चूँकि ब्रिटिश-अमेरीकियों का मित्र है, अतः उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था।

कृपया इस पर ध्यान दें और जो उचित तथा सही समझें वह करें।

आपका विश्वासी,
जवाहर लाल नेहरू”

अब देखें कि नेहरूजी के ‘अत्यंत भरोसेमन्द सूत्र’ ने क्या लिखा है। यह एक हस्तलिखित नोट है:

“नेताजी विमान द्वारा सायगन से चलकर 23 अगस्त 1945 को दोपहर 1:30 पर मंचुरिया के दाईरेन में पहुँचे। विमान एक जापानी बमवर्षक था। उनके साथ बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और गहने थे। विमान से उतरकर उन्होंने केले खाये और चाय पी। वे तथा चार अन्य व्यक्ति, जिनमें एक जापानी अधिकारी सिदेयी थे, जीप में बैठे और रूसी सीमा की ओर चले गये। करीब तीन घण्टे के बाद, जीप वापस लौटी और पायलट को टोक्यो वापस लौट जाने का निर्देश दिया गया।”

      उपर्युक्त जानकारी हमें ‘आई.एन.ए. डिफेन्स कमिटी’ के कॉन्फिडेन्शियल स्टेनो श्री श्यामलाल जैन के उस बयान से मिलती है, जो उन्होंने ‘खोसला आयोग’ (1970 में गठित) के सामने- बाकायदे शपथ उठाकर- दिया था। श्री जैन नेहरूजी के उस ‘अत्यंत भरोसेमन्द सूत्र’ का हस्ताक्षर नहीं पढ़ पाये थे, क्योंकि वह स्पष्ट नहीं था। मगर ‘सामग्री’ उन्हें याद रह गयी। एटली को लिखे पत्र का मजमून तो उन्हें याद रहना ही था, क्योंकि नेहरूजी के लेटरहेड की चार प्रतियों पर उन्होंने खुद इसे टाईप किया था।

       अगर नेहरूजी के ‘अत्यंत भरोसेमन्द सूत्र’ की जानकारी तथा श्री जैन की याददाश्त एकदम सही है, तो इसका मतलब यह हुआ कि नेताजी 18 अगस्त से 22 अगस्त 1945 तक ताईपेह में ही गुप्त रुप से रह रहे थे। 

जब देश आजाद हुआ, तब नेहरूजी की बहन विजयलक्ष्मी पण्डित मास्को में थीं। उन्हें सोवियत संघ में भारत की राजदूत घोषित कर दिया जाता है।

       जैसा कि बताया जाता है- मास्को से लौटकर एकबार पालम हवाई अड्डे पर श्रीमती पण्डित ने कहा- वे सोवियत संघ से ऐसी खबर लायी हैं, जिसे सुनकर देशवासियों को उतनी ही खुशी मिलेगी, जितनी की आजादी से मिली थी।

       कूटनीति के अनुसार, विदेश से लायी गयी किसी बड़ी खबर को आम करने से पहले (राजदूत को) देश के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री से सलाह लेनी पड़ती है। भारत के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री- दोनों नेहरूजी ही हैं। सो जाहिर है, विजयलक्ष्मी पण्डित फिर कभी वह “आजादी के समान प्रसन्नता देने वाली खबर” देशवासियों को नहीं सुना पायीं।

       इसी कहानी का एक दूसरा संस्करण भी है, जिसके अनुसार संविधान सभा में श्रीमती पण्डित कहती हैं कि उनके पास एक महत्वपूर्ण समाचार है, जो सारे देश में बिजली की तरंग प्रवाहित कर सकती है। इस पर नेहरूजी उन्हें बैठ जाने का ईशारा करते हैं।

       वह घटनाक्रम या बात चाहे जो भी रही हो, मगर इतना है कि-

1. विजयलक्ष्मी पण्डित को नेहरूजी मास्को से हटाकर वाशिंगटन भेज देते हैं- यानि उन्हें अमेरीका का राजदूत बना दिया जाता है। और

2. 1970 में गठित ‘खोसला आयोग’ इस विषय पर बयान देने के लिए श्रीमती पण्डित को बुलाता है, मगर वे उपस्थित नहीं होतीं।

मास्को में भारत के अगले राजदूत बनकर जाते हैं- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन।

       स्तालिन अब भी सोवियत संघ के राष्ट्रपति हैं। वे अक्सर राधाकृष्णन से मिलते हैं और दर्शनशास्त्र पर चर्चा करते हैं।

       प्रचलित कहानी के अनुसार, स्तालिन ने राधाकृष्णन को साइबेरिया जाकर नेताजी को ‘देखने’ की अनुमति प्रदान कर दी थी। उन्हें कुछ दूरी से नेताजी को देखना था- बातचीत नहीं करनी थी।

       इस कहानी के एक दूसरे संस्करण के अनुसार, डॉ. राधाकृष्णन मास्को में नेताजी से मिले थे और नेताजी ने बाकायदे उनसे अनुरोध किया था कि वे उनकी (नेताजी की) भारत वापसी की व्यवस्था करें। 

       सच्चाई चाहे जो हो, मगर इतना सच है कि भारत में इन खबरों ने ऐसा जोर पकड़ा कि डॉ. राधाकृष्णन को मास्को से बुलाना पड़ गया।

यहाँ तक तो बात सामान्य है- वह खबर एक अफवाह हो सकती है।

मगर इसके बाद नेहरूजी राधाकृष्णन को अचानक भारत का उपराष्ट्रपति बनवा देते हैं। जबकि काँग्रेस में उनसे वरिष्ठ कई नेता मौजूद हैं, जिनका स्वतंत्रता संग्राम में भारी योगदान रहा है।

मौलाना आजाद के मुँह से निकलता भी है- “क्या हम सब मर गये हैं?”

बाद के दिनों में ‘खोसला आयोग’ डॉ. राधाकृष्णन को भी सफाई देने के लिए बुलाता है। वे अस्पताल में आरोग्य लाभ कर रहे हैं, मगर ‘डिक्टेट’ करके वे अपना बयान टाईप करवा सकते थे- कि वह अफवाह सच्ची थी या झूठी; या आयोग खुद चेन्नई जाकर अस्पताल में उनकी गवाही ले सकता था… मगर ऐसा कुछ नहीं होता।

ऐसा नहीं है कि डॉ. राधाकृष्णन ने कभी कुछ कहा ही नहीं होगा। कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. सरोज दास और डॉ. एस.एम. गोस्वामी का कहना था कि डॉ. राधाकृष्णन ने उनसे नेताजी के रूस में होने की बात स्वीकारी थी।

सोवियत साम्यवादी पार्टी के क्राँतिकारी सदस्य तथा भारत की साम्यवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक अबनी मुखर्जी साइबेरिया की जेल में नेताजी के बगल वाले सेल में ही बन्द थे।

जेल में नेताजी “खिल्सायी मलंग” के नाम से जाने जाते थे।

अबनी, वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (सरोजिनी नायडु के भाई) के साथी थे। दोनों को स्तालिन ने 1937 से ही कैद कर रखा था। बाद में दोनों को स्तालिन मरवा देते हैं।

खिल्सायी मलंग वाली बात अबनि मुखर्जी ने अपने बेटे जॉर्जी मुखर्जी को बतायी थी और बाद में जॉर्जी ने नेहरूजी के मंत्रीमण्डल में मंत्री रहे सत्यनारायण सिन्हा को यह बात बतायी।

श्री सिन्हा भारत आकर इसे एक ताजी खबर समझकर नेहरूजी को इसके बारे में बताते हैं। मगर वे चकित रह गये यह देखकर कि खबर पर प्रसन्न होने के बजाय नेहरूजी उन्हें डाँटना शुरु कर देते हैं।

तब से दोनों के बीच सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं। श्री सिन्हा ने इस घटना का जिक्र अपनी किताब (‘नेताजी मिस्ट्री’) में किया है। खोसला आयोग को भी उन्होंने इसकी जानकारी दी थी।


माउण्टबेटन के बुलावे पर नेहरूजी जब 1946 में (भावी प्रधानमंत्री के रूप में) सिंगापुर जाते हैं, तब गुजराती दैनिक ‘जन्मभूमि’ के सम्पादक श्री अमृतलाल सेठ भी उनके साथ होते हैं।


लौटकर श्री सेठ नेताजी के भाई शरत चन्द्र बोस को बताते हैं कि एडमिरल लुई माउण्टबेटन ने नेहरूजी को कुछ इन शब्दों में चेतावनी दी है-


‘हमें खबर मिली है कि बोस विमान दुर्घटना में नहीं मरे हैं, और अगर आप जोर-शोर से उनका यशोगान करते हैं और आजाद हिन्द सैनिकों को भारतीय सेना में फिर से शामिल करने की माँग करते हैं, तो आप नेताजी के प्रकट होने पर भारत को उनके हाथों में सौंपने का खतरा मोल ले रहे हैं।’


       इस चेतावनी के बाद नेहरूजी सिंगापुर के ‘शहीद स्मारक’ (नेताजी द्वारा स्थापित) पर माल्यार्पण का अपना पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम रद्द कर देते हैं। बाद में वे कभी नेताजी की तारीफ नहीं करते; प्रधानमंत्री बनने पर आजाद हिन्द सैनिकों को भारतीय सेना में शामिल नहीं करते, नेताजी को ‘स्वतंत्रता-सेनानी’ का दर्जा नहीं दिलवाते, और… जैसाकि हम और आप जानते ही हैं… हमारी पाठ्य-पुस्तकों में स्वतंत्रता-संग्राम का इतिहास लिखते वक्त इसमें नेताजी और उनकी आजाद हिन्द सेना के योगदान का जिक्र न के बराबर किया जाता है।


       (उल्लेखनीय है कि 15 से 18 जुलाई 1947 को कानपुर में आई.एन.ए. के सम्मेलन में नेहरूजी से इस आशय का अनुरोध किया गया था कि आजादी के बाद आई.एन.ए. (आजाद हिन्द) सैनिकों को नियमित भारतीय सेना में वापस ले लिया जाय, मगर नेहरूजी इसे नहीं निभाते; जबकि मो. अली जिन्ना पाकिस्तान गये आजाद हिन्द सैनिकों को नियमित सेना में जगह देकर इस अनुरोध का सम्मान रखते हैं।)


जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रो. पूरबी रॉय एशियाटिक सोसायटी के तीन सदस्यीय दल की एक सदस्या के रुप में ‘ओरिएण्टल इंस्टीच्यूट’, मास्को जाती हैं- 1917 से 1947 तक के भारतीय दस्तावेजों के अध्ययन के लिए (शोध का विषय है- भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी का इतिहास)।


यह 1996 की बात है।


उन्हें पता चलता है कि साइबेरिया के ओम्स्क शहर में, जहाँ कि आजाद हिन्द सरकार का कौन्सुलेट था, सेना की आलमारियों में नेताजी से सम्बन्धित काफी दस्तावेज हैं और भारत सरकार के एक आधिकारिक अनुरोध पर ही उसे शोध के लिए खोल दिया जायेगा।


प्रो. रॉय पत्र लिखकर इस बात की सूचना भारत सरकार को देती हैं।


पत्र के जवाब में उनका शोध रोक दिया जाता है (शोध का खर्च सरकार ही उठा रही थी)। उन्हें बुला लिया जाता है और दुबारा मास्को नहीं जाने दिया जाता।


हालाँकि इस बीच प्रो. रॉय एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हासिल करने में सफल रहती हैं। वह दस्तावेज है- मुम्बई में नियुक्त (सोवियत गुप्तचर संस्था) के.जी.बी. के एक एजेण्ट की रिपोर्ट, जिसमें भारत की राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करते हुए एक स्थान पर कहा जा रहा है:


“…. नेहरू या गाँधी के साथ काम करना सम्भव नहीं है, हमें सुभाष बोस का इस्तेमाल करना ही होगा।”

(“… It is not possible to work with Nehru or Gandhi, we have to use Subhas Bose”)

यह रिपोर्ट 1946 का है। अर्थात् 1946 में नेताजी जीवित थे और सोवियत संघ में ही थे!

मार्च 1967 में स्तालिन की बेटी श्वेतलाना को भारत आने की अनुमति मिलती है- अपने पति स्वर्गीय ब्रजेश सिंह का अस्थिभस्म उनके परिवारजनों को सौंपने के लिए। यहाँ प्रेस-कॉन्फ्रेन्स कर वे अपने पिता स्तालिन के शासन की निन्दा करती हैं और अमेरीकी दूतावास से शरण माँग लेती हैं। सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध न बिगड़े, इस डर से भारत सरकार उन्हें स्वीजरलैण्ड होते हुए अमेरीका जाने का मशविरा देती है- वे ऐसा ही करती हैं।

प्रेस-कॉन्फ्रेन्स में श्वेतलाना नेताजी के बारे में बताती हैं कि नेताजी साइबेरियायी शहर याकुत्स्क की जेल के बैरक नम्बर 465 में रहते थे। उनके द्वारा किया गया यह रहस्योद्घाटन उस समय सभी अखबारों में छपा था।

श्वेतलाना स्तालिन की सौतेली बेटी हैं- उनकी माँ स्तालिन की सचिव रहीं थीं। 

श्वेतलाना अल्लुलियेवा की इस खबर से संबंधता रखता एक प्रमाणित रूसी न्यूज लिंक निम्नांकित है।

http://in.rbth.com/articles/2011/12/06/svetlana_alliluyeva_the_indian_episode_that_nearly_triggered_a_major_13346

 28 दिसंबर 1885 को जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी, तब भी रविवार का ही दिन था। हालांकि इसकी स्थापना के पीछे ब्रिटिश प्रशासक ए.ओ. ह्यूम का मकसद ब्रिटिश सत्ता का राजनीतिक हित साधने का था, लेकिन ह्यूम इसमें नाकाम रहे और यह आजादी के आंदोलन का हिस्सा बन गया। आजादी मिलने के बाद महात्मा गांधी ने कांग्रेस को खत्म करने का प्रस्ताव भी रखा था, लेकिन इस पर आम सहमति नहीं बन पायी। समय के साथ इसका रूप और रंग बदला। नहीं बदला तो इसके साथ जुड़ा गांधी शब्द। 130 साल के कांग्रेस में आज भी गांधी और कांग्रेस एक दूसरे का पर्याय बना हुआ है।

आज अगर कांग्रेस नेतृत्व की बात करें तो सोनिया गांधी देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाली पहली महिला हैं। सोनिया गांधी ने नेहरू-गांधी परिवार के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। 130 साल की इस पार्टी में करीब 41 साल तक नेहरू-गांधी परिवार के लोग ही अध्यक्ष रहे। नेहरू परिवार से सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू अमृतसर में वर्ष 1919 में अध्यक्ष चुने गए। वह 1920 तक अध्यक्ष रहे। मोतीलाल वर्ष 1929 में फिर से अध्यक्ष चुने गए और करीब एक साल तक अपने पद पर रहे।

मोतीलाल के बाद उनके बेटे जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष बने। नेहरू करीब छह बार 1930, 1936, 1937, 1951, 1953 और 1954 में कांग्रेस अध्यक्ष बने। पंडित नेहरू के बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी दो बार अध्यक्ष बनी। इंदिरा वर्ष 1959 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बनीं और 1960 तक रहीं। वह दोबारा वर्ष 1978 में कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गर्इं और अगले छह साल तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं। इंदिरा के बाद उनके बेटे राजीव गांधी 1984 के मुंबई अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए और वह 1991 तक इस पद पर रहे।

राजीव गांधी के निधन के बाद नेहरू-गांधी परिवार ने काफी समय तक कांग्रेस से दूरी बनाए रखी। कांग्रेस पतन की ओर बढ़ने लगी। और फिर वर्ष 1998 में राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी ने राजनीति में कदम रखा। वह पार्टी की निर्विरोध अध्यक्ष चुनीं गई। तब से लेकर 19 साल तक वह अध्यक्ष बनी।

एक और ऐतिहासिक कलंक गाँधीजी व काँग्रेस के माथे पर उनकी बदनियति की कथा कहता रहेगा ..

26 जनवरी 1931 को कोलकाता में राष्ट्र ध्वज फहराकर सुभाष एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे तभी पुलिस ने उन पर लाठी चलायी और उन्हें घायल कर जेल भेज दिया। जब सुभाष जेल में थे तब गान्धीजी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया और सब कैदियों को रिहा करवा दिया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने सरदार भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों को रिहा करने से साफ इन्कार कर दिया। भगत सिंह की फाँसी माफ कराने के लिये गान्धी ने सरकार से बात तो की परन्तु नरमी के साथ। सुभाष चाहते थे कि इस विषय पर गान्धीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें। लेकिन गान्धी अपनी ओर से दिया गया वचन तोड़ने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अड़ी रही और भगत सिंह व उनके साथियों को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने पर सुभाष गान्धी और कांग्रेस के तरीकों से बहुत नाराज हो गये।

नवम्बर 1945 में दिल्ली के लालकिले में आजाद हिन्द फौज पर चलाये गये मुकदमे ने नेताजी के यश में वर्णनातीत वृद्धि की और वे लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुँचे। अंग्रेजों के द्वारा किए गये विधिवत दुष्प्रचार तथा तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा सुभाष के विरोध के बावजूद सारे देश को झकझोर देनेवाले उस मुकदमे के बाद माताएँ अपने बेटों को ‘सुभाष’ का नाम देने में गर्व का अनुभव करने लगीं। घर–घर में राणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज के जोड़ पर नेताजी का चित्र भी दिखाई देने लगा।
आजाद हिन्द फौज के माध्यम से भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करने का नेताजी का प्रयास प्रत्यक्ष रूप में सफल नहीं हो सका किन्तु उसका दूरगामी परिणाम हुआ। सन् 1946 में रॉयल अयर फोर्स के विद्रोह इसके तुरंत बाद के नौसेना विद्रोह इसका उदाहरण है। नौसेना विद्रोह के बाद ही ब्रिटेन को विश्वास हो गया कि अब भारतीय सेना के बल पर भारत में शासन नहीं किया जा सकता और भारत को स्वतन्त्र करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा, इन सबके मद्देनज़र काँग्रेस का आजादी में योगदान न्यूनतम ही था।

आजाद हिन्द फौज को छोड़कर विश्व-इतिहास में ऐसा कोई भी दृष्टांत नहीं मिलता जहाँ तीस-पैंतीस हजार युद्धबन्दियों ने संगठित होकर अपने देश की आजादी के लिए ऐसा प्रबल संघर्ष छेड़ा हो।

जहाँ स्वतन्त्रता से पूर्व विदेशी शासक नेताजी की सामर्थ्य से घबराते रहे, तो स्वतन्त्रता के उपरान्त देशी सत्ताधीश जनमानस पर उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व के अमिट प्रभाव से घबराते रहे। स्वातंत्र्यवीर सावरकर  ने स्वतन्त्रता के उपरान्त देश के क्रांतिकारियों के एक सम्मेलन का आयोजन किया था और उसमें अध्यक्ष के आसन पर नेताजी के तैलचित्र को आसीन किया था। यह एक क्रान्तिवीर द्वारा दूसरे क्रान्ति वीर को दी गयी अभूतपूर्व सलामी थी।

भारत ने जानबूझकर धर्म निरपेक्ष राज्य बनना पसंद किया। उसने आश्वासन दिया कि जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान को निर्गमन करने के बजाय भारत में रहना पसंद किया है उनको नागरिकता के पूर्ण अधिकार प्रदान किये जायेंगे। हालाँकि पाकिस्तान जानबूझकर अपने यहाँ से हिंदुओं को निकाल बाहर करने अथवा जिन हिन्दुओं ने वहाँ रहने का फैसला किया था, उनको एक प्रकार से द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देने की नीति पर चल रहा था। माऊंटबेटन को स्वाधीन भारत का पहला गवर्नर जनरल बनाये रखा गया और जवाहर लाल नेहरू तथा अंतरिम सरकार में उनके कांग्रसी सहयोगियों ने थोड़े से हेरफेर के साथ पहले भारतीय मंत्रिमंडल का निर्माण किया। इस मंत्रिमंडल में सरदार पटेल तथा मौलाना आज़ाद को तो सम्मिलित कर लिया गया था, परन्तु नेताजी बोस के बड़े भाई शरतचंद्र बोस को जानबूझकर छोड़ दिया गया, हाशिये पर डाला गया।

नेहरू ने अन्य नेताओं की तुलना में भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में बहुत कम योगदान दिया था। फिर भी गांधीजी ने उन्हे भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बना दिया जबकि भारत के असल परिधान मंत्री तो नेहरू ही थे। स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के कांग्रेसी सूत्रधारों ने प्रकारांतर से देश में राजतंत्र चलाया, विचारधारा के स्थान पर व्यक्ति पूजा को प्रतिष्ठित किया और तथाकथित लोकप्रियता के प्रभामंडल से आवेष्टित रह लोकहित की पूर्णत: उपेक्षा की और यह सब किया ब्रिटिश हितों की सदैव रक्षक रही काँग्रेस ने…!!

गांधीजी का निश्चित रूप से स्वतन्त्रता आंदोलनों में महान योगदान था व वे उस समय के बहुस्वीकृत नेता अवश्य थे किन्तु सर्वस्वीकृत नहीं! इसमें भी इतिहास के किसी संक्षिप्त जानकार को मतभेद नहीं हो सकता कि गांधीजी स्वतन्त्रता आन्दोलन की अहिंसावादी विचारधारा के नायक अवश्य थे किन्तु उन्हें स्वतन्त्रता का जनक अथवा पिता कदापि नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसा कहना उन 7,32,000 वीर बलिदानियों की उपेक्षा होगी जिन्होंने गांधीजी के भारत आगमन से पहले अथवा उनके जन्म लेने से पूर्व ही स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए अपना संपत्ति, परिवार व प्राण दांव पर लगाकर अपने रक्त से मातृभूमि को सींच दिया था। गांधीजी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 में हुआ था जबकि अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतन्त्रता प्राप्ति का महाशंखनाद तो 1857 की क्रांति से ही हो गया था जिसमे लाखों स्त्री-पुरुषों ने अपना बलिदान दिया था। क्रान्ति का केन्द्र रहे बिठूर में रातो-रात 24,000 निहत्थे लोगों की बर्बर हत्या व हजारों स्त्रियों का बलात्कार अंग्रेजों द्वारा किया गया था। इस दृष्टि से प्रथम संगठित क्रान्ति का जनक यदि किसी को कहा जा सकता है तो वह वीर मंगल पाण्डेय थे यद्यपि अंग्रेजों के विरुद्ध असंगठित क्रान्ति का इतिहास उनसे भी पुराना है। 1770 में अंग्रेजों के विरुद्ध हिन्दू सन्यासियों ने सशस्त्र क्रान्ति का बिगुल बजाया था जिसमें हजारों सन्यासियों ने अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिये थे। इसके बाद फिर संथाल विद्रोह, कोल जाति के संघर्ष, भील जाति के विद्रोह, अहोमो की क्रान्ति, चुआर लोगो का विद्रोह, ख़ासी विद्रोह, रमोसी विद्रोह, बधेरा विद्रोह, कच्छ का विद्रोह, दक्षिण में विजयनगर का अंग्रेजों के साथ संघर्ष तथा 1806 के वेल्लौर व 1824 के बैरकपुर के सैनिक विद्रोह जैसी लंबी सूची इतिहास के स्वतन्त्रता अध्यायों में अंकित है, भले ही ये अध्याय इतिहास के राजनीतिकरण के अंधेरे में खो गए हों! अतः गांधीजी स्वतन्त्रता आंदोलन की भव्य श्रंखला की एक कड़ी अवश्य थे किन्तु उसके जनक नहीं! गांधीजी राष्ट्रपिता के रूप में देश के आम जनमानस द्वारा कभी स्वीकार भी नहीं किए गए क्योंकि गांधीजी की नीतियों से न सारा देश खुश ही था और न उनके द्वारा की गई महान घातक भूलों के प्रति संवेदनाहीन! कहा जाता है कि गांधीजी को सर्वप्रथम “राष्ट्रपिता” नेताजी सुभाषचंद्र बोष ने एक सम्बोधन में बोला था व उनसे आशीर्वाद मांगा था। नेताजी व गांधीजी के मध्य विचारात्मक व नीतिगत मतभेद सर्वविदित हैं अतः यह कहना कठिन है गांधीजी के मार्ग के ठीक विपरीत आजाद हिन्द सेना गठित कर अंग्रेजों पर आक्रमण करने के समय यदि नेताजी ने गांधीजी को राष्ट्रपिता बोला तो उनका आशय क्या था! नेताजी गांधी की नीतियों को रूढ व निरर्थक अहिंसा मानते थे वही गांधीजी व नेहरू नेताजी को फासीवादी उग्रवादी कहने में संकोच नहीं करते थे। 1939 के कांग्रेस अधिवेशन में गांधीजी के खुले विरोध के बाद भी नेताजी काँग्रेस के प्रधान चुने गए, इतिहासकार इसे गांधीजी की सबसे बड़ी हार मानते हैं। बाद में कांग्रेस के अंदर गांधी समर्थकों की बहुलता के कारण नेताजी को पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। इस घटना ने सिद्ध कर दिया था गांधीजी न तो स्वयं सर्वमान्य नेता थे और न उनकी नीतियाँ ही। हाँलाकि यह सत्य है कि इसके बाद भी नेताजी गांधीजी को पूर्ण सम्मान देते रहे, यह भारत की अद्भुत संस्कृति है। 1926 में एकबार चन्द्र्शेखर आजाद गांधी जी से मिले व निवेदन किया कि आप अपने व्यक्तिगत संबोधनों में हम क्रांतिकारियों को आतंकवादी मत कहा करिए यद्यपि हमारे मार्ग पृथक हैं किन्तु हम आपका बहुत सम्मान करते हैं, इसपर गांधीजी ने प्रतिउत्तर दिया कि तुम्हारा मार्ग हिंसा का है और हिंसा का अवलंबन लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति मेरी दृष्टि में आतंकवादी है!! 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में जेल रहे गांधीजी जब 1931 में छूटे और लॉर्ड इरविन के साथ 5 मार्च 1931 को इरविन समझौता किया। सविनय अवज्ञा आंदोलन निष्फल हो चुका था व उस समय भगत सिंह सुखदेव व राजगुरु के साथ जेल मे थे जिनके समर्थन में देश मे भारी जनाक्रोश था। इंग्लैंड के लेबर पार्टी के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री रैमसी मैकडोनाल्ड ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि भगत सिंह आदि का उद्देश्य हत्या आदि का नहीं था। अतः लॉर्ड इरविन पर भगत सिंह मामले पर भारी दबाब था, इरविन ने इस विषय पर समझौते के समय गांधीजी से पूंछा तो गांधीजी ने कहा “मैं भगत सिंह की भावना की कद्र करता हूँ किन्तु हिंसा के किसी पुजारी को छोडने की पैरवी नहीं कर सकता! प्रतिउत्तर में भगत सिंह ने कहा था प्राणों की भीख से अच्छा मैं यहीं प्राण दे दूँ, अच्छा हुआ गांधीजी ने मेरी पैरवी नहीं की। समझौते के 18 दिनों बाद ही 23 मार्च को भगत सिंह को फांसी पर लटका दिया गया था। इसके लिए गांधीजी की पूरे देश में आलोचना हुई व उन्हें कई स्थानों पर काले झंडे दिखाये गए थे। गांधीजी के स्वतन्त्रता आन्दोलन भी कभी सतत नहीं रहे, 1920 में प्रारम्भ किया गया असहयोग आंदोलन चौरीचौरा-कांड, जिसमें अंग्रेजों की पुलिस चौकी को भीड़ ने जला दिया था, से छुब्ध होकर 1922 में गांधीजी ने वापस ले लिया था और सविनय अवज्ञा आंदोलन तक राजनैतिक रूप से लगभग निष्क्रिय ही रहे जिसका हश्र भी निराशात्मक ही रहा जैसा कि ऊपर स्पष्ट है। गांधीजी “भारत छोड़ो आंदोलन” से पूर्व तक कांग्रेस के “डोमिनियन स्टेट” की मांग से ही संतुष्ट थे और पूर्ण स्वराज्य की मांग के इस आंदोलन को भी 1942 के दो वर्ष बाद ही 1944 में जेल से छोड़े जाने पर वापस ले लिया था। इसके अतिरिक्त गांधीजी ने अहिंसा पर अंधश्रद्धा के कारण कई बड़ी भूले की। अंग्रेजों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी का साथ देने के कारण तुर्की के खलीफा के विरुद्ध कार्यवाही की, रूढ़िवादी मुसलमानों ने, जोकि भारत में हो रहे अंग्रेज़ी अत्याचार पर तो शान्त थे, इसे इस्लाम पर प्रहार कहते हुए अंग्रेजों के विरुद्ध खिलाफत आंदोलन खड़ा कर दिया। विपिन चन्द्र पाल व महामना मदनमोहन मालवीय जैसे लोगों की चेतावनी के बाबजूद गांधीजी ने इस सांप्रदायिक -अराष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन किया। खिलाफत को तो अंग्रेजों ने कुचल दिया किन्तु इस्लामी कट्टरपंथ की आग ने दंगों में हजारों निर्दोष हिंदुओं को कत्ल कर दिया। मालाबार (मोपला) में 20,0000 हिंदुओं का धर्मपरिवर्तन हुआ, 27000 हिंदुओं का कत्ल हुआ, हिन्दू औरतों का बलात्कार हुआ व गर्भवती महिलाओं को पेट मे चाकू घुसेडकर ,पेट फाडकर मार दिया गया।

गांधीजी ने इसे अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान कहकर उन मोपला मुसलमानों की प्रशंसा की, यद्यपि आजाद व भगत सिंह को वे आतंकवादी बताते आए थे।

डॉ अंबेडकर ने अपनी पुस्तक “भारत का विभाजन” में इस घटना पर गांधीजी की आलोचना करते हुए लिखा है कि गांधीजी ने ऐसी घटनाओं की आलोचना का कभी साहस नहीं किया। इसी तरह “भारत विभाजन मेरी लाश पर होगा” कहने के बाद भी गांधीजी ने विभाजन स्वीकार कर लिया। देश के एक भाग ने गांधीजी को भी विभाजन का दोषी माना जिससे क्षुब्ध होकर नाथुराम गोडसे ने अतिरेक में गांधीजी की हत्या कर दी। 

वास्तविकता में तब के अखंड भारत में गांधीजी को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों की सेना के लिए घूम घूम कर लोगों को भर्ती करवाने के कारण “भर्ती करवाने वाला एजेंट” कहा जाता था। इसी तरह पाकिस्तान को स्वयं की कंगाली हालत में 56 करोड रूपयों की सहायता देने के लिए अनशन से लेकर दिल्ली की जामा मस्जिद में आश्रय लिए विस्थापित हिन्दुओं को मुसलमानो की आस्था की रक्षा के नाम पर बाहर निकालने की मांग तक गांधीजी की ऐसी ही कई नीतियाँ मुखर आलोचना का शिकार हुईं। इसी प्रकार गांधीजी के सत्य के नग्न प्रयोग भी किसी भी ब्रम्ह्चारी अथवा किसी भी भोगवादी द्वारा समझे अथवा स्वीकारे नहीं जा सके!

1885 में ए.ओ ह्यूम ने जिस कांग्रेस की स्थापना की थी उसका उद्देश्य देशव्यापी क्रान्ति को मार्ग से भटकाना था। 1886 के प्रथम सम्मेलन में काँग्रेस के अध्यक्ष पद से दादा भाई नौरोजी ने अंग्रेजों के शासन के कई लाभ गिनाये व बाद में महारानी विक्टोरिया की जय के नारे लगाए गए।

लाला लाजपत राय कांग्रेस को अंग्रेजों का सेफ़्टी वॉल्व कहते थे। इस प्रयास के बाद भी स्वतन्त्रता का सम्पूर्ण श्रेय गांधीजी व उनके आंदोलनों को नहीं दिया जा सकता क्योंकि कांग्रेस सत्ता मे अपनी भागीदारी के लिए केवल “डोमिनियन स्टेट” के दर्जे की मांग ही करती रही थी। स्वतन्त्रता कांग्रेस की नीतियों का नहीं द्वितीय विश्व युद्ध का परिणाम थी जिसमे नेताजी सुभाष ने अंग्रेजों की सेना के ही भारतीय सैनिकों को खड़ाकर आजाद हिन्द सेना का गठन किया व अंग्रेज़ो पर आक्रमण किया, अतः युद्ध के बाद कमजोर पड़ चुके इंग्लैंड के सामने भारतीय सेना पर विश्वास उठने के कारण भारत को खाली करने के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं बचा था। नौसेना के विद्रोह ने इसे अंतिम रूप दे दिया।

अतः इतिहास के संक्षिप्त विवरण से स्पष्ट है कि गांधीजी जन के पिता के रूप में स्वीकार्य नहीं हो पाये और स्वतन्त्रता कांग्रेस ने नहीं दिलाई और ना ही गांधीजी व काँग्रेस को बिना खडग बिना ढाल आजादी दिलाने वाले एकमात्र अहिंसक स्वतंत्रता सेनानी ही कहे जा सकते हैं, हाँलाकि कांग्रेसियों को एक वरिष्ठ स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में स्वीकार करने आपत्ति नहीं की जा सकती। अब यदि संस्कृति की दृष्टि से बात करें तो विश्व की सबसे प्राचीन, महान व सुसंस्कृत सभ्यता का पिता उन्नीसवीं सदी में जन्मा हो, इससे अधिक असंगत कांग्रेस का मानसिक दिवालियापन पर कुछ और क्या कहा जा सकता है??
भारत की महानतम परंपरा में वाल्मीकि, वेदव्यास, पाणिनि, कपिल, यास्क, शंकराचार्य, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, कालिदास व चाणक्य जैसे लाखों उद्भट विद्वान ब्रम्हाण्ड के चरम तक चिंतनशील दार्शनिक व वैज्ञानिक, भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, गुरुनानक, कबीर, तुलसीदास व रामकृष्ण परमहंस जैसे लाखों महात्मा सन्त, जनक युधिष्ठिर से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त, शालिवाहन, महाराणा प्रताप, शिवाजी जैसे लाखों वीर शासक, वीर हकीकत राय व मंगलपाण्डेय से लेकर नाना साहब पेशवा, रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, वासुदेव बलबंत फडके व तात्या टोपे जैसे लाखों क्रान्तिकारी बलिदानी तथा रामतीर्थ, महर्षि रमण व विवेकानन्द जैसे हजारों आधुनिक काल के विचारकों ने जन्म लिया है …किंतु काँग्रेस व वामपंथी नेक्सस द्वारा रचित ‘कुत्सित नवइतिहास’ में लगातार इन सबके योगदानों को गौण करने व छवि बिगाड कर बागियों के रूप में ही दर्शाने का लगातार प्रयत्न आजतारीख तक जारी है ।

भारतदेश की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन दो प्रकार का था – एक अहिंसक आन्दोलन एवं दूसरा सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन। भारत की आज़ादी के लिए 1757 से 1947 के बीच जितने भी प्रयत्न हुए, उनमें स्वतंत्रता का सपना संजोये क्रान्तिकारियों और शहीदों की उपस्थित सबसे अधिक प्रेरणादायी सिद्ध हुई।

वस्तुतः भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग है। भारत की धरती के प्रति जितनी भक्ति और मातृ-भावना उस युग में थी, उतनी कभी नहीं रही। मातृभूमि की सेवा और उसके लिए मर-मिटने की जो भावना उस समय थी, आज उसका नितांत अभाव हो गया है।

क्रांतिकारी आंदोलन का समय सामान्यतः लोगों ने सन् 1857 से 1942 तक माना है। जगप्रसिद्ध मत है कि इसका समय सन् 1757 अर्थात् प्लासी के युद्ध से सन् 1961 अर्थात् गोवा मुक्ति तक मानना चाहिए। सन् 1961 में गोवा मुक्ति के साथ ही भारतवर्ष पूर्ण रूप से स्वाधीन हो सका है।

भारत की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेसी नेताओं ने भारत के सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन को प्रायः दबाते हुए उसे इतिहास में कम महत्व दिया और कई स्थानों पर उसे पोषित लेखकों व इतिहासकारों द्वारा विकृत भी किया गया या करवाया गया,, स्वराज्य उपरांत यह सिद्ध करने की चेष्टा की गई कि हमें स्वतंत्रता केवल कांग्रेस के अहिंसात्मक आंदोलन के माध्यम से मिली है ,, इस नये विकृत इतिहास में स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले, सर्वस्व समर्पित करने वाले असंख्य क्रांतिकारियों, अमर हुतात्माओं की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई ।

सशस्त्र विद्रोह की एक अखण्ड परम्परा है। भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के साथ ही सशस्त्र विद्रोह का आरम्भ हो गया था। बंगाल में सैनिक-विद्रोह, चूआड विद्रोह, संन्यासी विद्रोह, संथाल विद्रोह अनेक सशस्त्र विद्रोहों की परिणति सत्तावन के विद्रोह के रूप में हुई। प्रथम स्वातन्त्र्य–संघर्ष के असफल हो जाने पर भी विद्रोहाग्नि ठण्डी नहीं हुई। शीघ्र ही दस-पन्द्रह वर्षों के बाद पंजाब में कूका विद्रोह व महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के के छापामार युद्ध शुरू हो गए। संयुक्त प्रान्त में पं॰ गेंदालाल दीक्षित ने शिवाजी समिति और मातृदेवी नामक संस्था की स्थापना की। बंगाल में क्रान्ति की अग्नि सतत जलती रही। सरदार अजीतसिंह ने सत्तावन के स्वतंत्रता–आन्दोलन की पुनरावृत्ति के प्रयत्न शुरू कर दिए। रासबिहारी बोस और शचीन्द्रनाथ सान्याल ने बंगाल, बिहार, दिल्ली, राजपूताना, संयुक्त प्रान्त व पंजाब से लेकर पेशावर तक की सभी छावनियों में प्रवेश कर 1915 में पुनः विद्रोह की सारी तैयारी कर ली थी। दुर्दैव से यह प्रयत्न भी असफल हो गया। इसके भी नए-नए क्रान्तिकारी उभरते रहे। राजा महेन्द्र प्रताप और उनके साथियों ने तो अफगान प्रदेश में अस्थायी व समान्तर सरकार स्थापित कर ली। सैन्य संगठन कर ब्रिटिश भारत से युद्ध भी किया। रासबिहारी बोस ने जापान में आज़ाद हिन्द फौज के लिए अनुकूल भूमिका बनाई।

मलाया व सिगांपुर में आज़ाद हिन्द फौज संगठित हुई। सुभाषचन्द बोस ने इसी कार्य को आगे बढ़ाया। उन्होंने भारतभूमि पर अपना झण्डा गाड़ा। आज़ाद हिन्द फौज का भारत में भव्य स्वागत हुआ, उसने भारत की ब्रिटिश फौज की आँखें खोल दीं। भारतीयों का नाविक विद्रोह तो ब्रिटिश शासन पर अन्तिम प्रहार था। अंग्रेज़, मुट्ठी-भर गोरे सैनिकों के बल पर नहीं, बल्कि भारतीयों की फौज के बल पर शासन कर रहे थे। आरम्भिक सशस्त्र विद्रोह में क्रान्तिकारियों को भारतीय जनता की सहानुभूति प्राप्त नहीं थी। वे अपने संगठन व कार्यक्रम गुप्त रखते थे। अंग्रेज़ी शासन द्वारा शोषित जनता में उनका प्रचार नहीं था। अंग्रेजों के क्रूर व अत्याचारपूर्ण अमानवीय व्यवहारों से ही उन्हें इनके विषय में जानकारी मिली। विशेषतः काकोरी काण्ड के अभियुक्त तथा भगतसिंह और उसके साथियों ने जनता का प्रेम व सहानुभूति अर्जित की। भगतसिंह ने अपना बलिदान क्रांति के उद्देश्य के प्रचार के लिए ही किया था। जनता में जागृति लाने का कार्य महात्मा गांधी के चुम्बकीय व्यक्तित्व ने किया। बंगाल की सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी श्रीमती कमला दास गुप्ता ने कहा कि क्रांतिकारी की निधि थी कम व्यक्ति अधिकतम बलिदान, महात्मा गांधी की निधि थी अधिकतम व्यक्ति न्यूनतम बलिदान। सन् ’42 के बाद उन्होंने अधिकतम व्यक्ति तथा अधिकतम बलिदान का मंत्र दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में क्रांतिकारियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

भारतीय क्रांतिकारियों के कार्य सिरफिरे युवकों के अनियोजित कार्य नहीं थे, भारतमाता की गुलामी श्रृंखला तोड़ने के लिए सतत संघर्ष करने वाले देशभक्तों की एक अखण्ड परम्परा थी, देश की रक्षा के लिए कर्तव्य समझकर उन्होंने शस्त्र उठाए थे। क्रान्तिकारियों का उद्देश्य अंग्रेजों का रक्त बहाना नहीं था। वे तो अपने देश का सम्मान लौटाना चाहते थे। अनेक क्रान्तिकारियों के हृदय में क्रांति की ज्वाला थी, तो दूसरी ओर अध्यात्म का आकर्षण भी। हंसते हुए फाँसी के फंदे का चुम्बन करने वाले व मातृभूमि के लिए सरफरोशी की तमन्ना रखने वाले ये देशभक्त युवक भावुक ही नहीं, विचारवान भी थे। शोषणरहित समाजवादी प्रजातंत्र चाहते थे। उन्होंने देश के संविधान की रचना भी की थी। सम्भवतः देश को स्वतंत्रता यदि सशस्त्र क्रांति के द्वारा मिली होती तो भारत का विभाजन नहीं हुआ होता, क्योंकि सत्ता उन हाथों में न आई होती, जिनके कारण देश में अनेक भीषण समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं , और तो और अंग्रेज भक्त ही रहे भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने करीब दो दशकों तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रिश्तेदारों की जासूसी करवाई थी। गुप्त सूची से हाल ही में हटाई गईं इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) की दो फाइलों से यह खुलासा हुआ है ये फाइल्स नैशनल आर्काइव्स में हैं , इनसे पता चलता है कि 1948 से लेकर 1968 तक लगातार बोस के परिवार पर नजर रखी गई थी,, यह जानकारी नेशनल आर्काइव की गुप्त सूची से हाल ही में हटाई गईं इंटेलीजेंस ब्यूरो की दो फाइलों से मिली है। फाइलों से पता चला है कि 1948 से 1968 के बीच सुभाष चंद्र बोस के परिवार पर अभूतपूर्व निगरानी रखी गई थी,, इन 20 सालों में से 16 सालों तक नेहरू प्रधानमंत्री थे और आईबी सीधे उन्हें ही रिपोर्ट करती थी इन फाइलों से मिली जानकारी के मुताबिक , बोस के कोलकाता के दो घरों की निगरानी की गई इनमें से एक वुडबर्न पार्क और दूसरा 38/2 एल्गिन रोड पर था,, अकाट्य सत्य है कि 1948 से 1968 के इन 20 साल में से 16 साल तक नेहरू ही देश के प्रधानमंत्री थे,आईबी उन्हीं के अंतर्गत काम करती थी ,फाइलों से मिली जानकारी के मुताबिक, बोस के कोलकाता स्थित दो घरों की निगरानी की गई हालिया प्रकाशित समाचारों के अनुसार बोस के घरों की जासूसी ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू की गई थी और नेहरू सरकार ने इसे दो दशक तक जारी रखा। खबर व सूचना समेत पारिवारिक मिलन व जानकारों की इंटरसेप्टिंग और बोस परिवार की चिट्ठियों पर नजर रखने के अलावा, आईबी के जासूसों ने उनकी स्थानीय और विदेश यात्रा की भी जासूसी की ऐसा लगता है कि एजेंसी यह जानने को आतुर थी कि बोस के रिश्तेदार किससे मिलते हैं और क्या चर्चा करते हैं हाथ से लिखे गए कुछ संदेशों से पता चला है कि आईबी के एजेंट बोस परिवार की गतिविधियों के बारे में आईबी हेडक्वार्टर में फोन करते थे। इस जगह हो ‘सिक्योरिटी कंट्रोल’ कहा जाता था।हालांकि, इस जासूसी की वजह पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है। आईबी ने नेताजी के भतीजों शिशिर कुमार बोस और अमिय नाथ बोस पर कड़ी निगरानी रखी। शरत चंद्र बोस के ये दोनों बेटे नेताजी के करीबी माने जाते थे। नेताजी की पत्नी एमिली शेंकल ऑस्ट्रिया में रहती थीं और शिशिर-अमिय ने उनके नाम कुछ चिट्ठियां भी लिखी थीं।इस खुलासे से बोस परिवार हैरान है। बोस के पड़पोते चंद्रकुमार बोस ने कहा कि जासूसी उन लोगों की होती है, जिन्होंने कोई अपराध किया हो या जिनके आतंकियों से संबंध हों। सुभाष बाबू और उनके परिवार ने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी, उनकी जासूसी क्यों की गई….?

क्या लंपट नेहरू के परिवार (अब नकली गांधी परिवार) तथा महात्मा गांधी के परिवार समेत देशद्रोही पोते के परिवार और लंपट देशद्रोही कर्नल शाहनवाज़ खान (अभिनेता शाहरूख़ खान का नाना और आजाद हिंद फौज का गद्दार तथा नेहरू का विश्वास पात्र भूतपूर्व रेलराज्य मंत्री रहा देशद्रोही) की इस तरह जासूसी करना क्यों आवश्यक नहीं समझा गया..???
इसका एकमात्र स्पष्टीकरण यही है कि कांग्रेस सुभाष चंद्र बोस की वापसी से डरी हुई थी,, बोस अब जिंदा हैं या नहीं, इस पर सरकार को शायद कभी भी भरोसे लायक पक्की जानकारी ही नहीं थी,भारत सरकार ने सोचा होगा कि अगर वह जिंदा होंगे, तो कोलकाता में अपने परिवार से संपर्क जरूर करते होंगे।

हाल में ही सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक नहीं किये जाने के खिलाफ कोलकाता हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से सफाई मांगी है। कोर्ट ने मोदी सरकार से बोस की फाइलें सार्वजनिक नहीं किये जाने की वजहों को बताने के लिए कहा है,, कोलकाता हाईकोर्ट के जज एके बनर्जी और शिवाकांत प्रसाद की बेंच ने मोदी सरकार से बोस की फाइलों के बारे में सवाल पूछा है। कोर्ट ने पूछा है कि जनहित में बोस से जुड़ी खुफिया फाइलों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता है,, कोर्ट ने बोस की फाइलों को सार्वजनिक नहीं किये जाने पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि 2007 में सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन ने बोस जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक किये जाने की संस्तुति दी थी बावजूद इसके बोस की फाइलों को सार्वजनक क्यों नहीं किया जा रहा है, केंद्र सरकार को 25 अप्रैल 2015 के भीतर फाइलों को सार्वजनिक नहीं किये जाने की वजहों को बताने का समय दिया गया है गौरतलब है कि नेशनल आर्काइव की गुप्त सूची से हटाई गई खुफिया ब्यूरों की दो फाइलों से इस बात का खुलासा हुआ है कि करीब 20 सालों तक जवाहर लाल नेहरू ने बोस के रिश्तेदारों की जासूसी करवाई थी इन खुफिया फाइलों से यह भी खुलासा हुआ है कि बोस के परिवार की काफी जबरदस्त तरीके से जासूसी की जा रही थी,साथ ही फाइलों से मिली जानकारी के अनुसार नेताजी के कोलकाता स्थित दोनों घरों से परहर समय नजर रखी जाती थी, फाइलों से खुलासा हुआ है कि आईबी नेताजी के भतीजों शिशिर कुमार बोस और अमिय नाथ बोस पर हर समय पैनी नजर रखती थी। बताया जाता है कि शरत चंद्र बोस के ये दोनों बेटे नेता जी के बेहद करीबी थे। वहीं नेता जी की पड़पोते का दावा है कि नेहरू जी को इस बात का डर था कि अगर बोस वापस भारत आते हैं तो वह देश के सबसे बड़े नेता होंगे और वह देश की कमान संभाल सकते थे।

http://hindi.oneindia.com/news/india/high-court-ask-modi-government-to-give-its-reason-fot-not-declassifying-bose-secret-350131.html

जिन शहीदों के प्रयत्नों व त्याग से हमें स्वतंत्रता मिली, उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। अनेकों को स्वतंत्रता के बाद भी गुमनामी का अपमानजनक जीवन जीना पड़ा, ये शब्द उन्हीं शहीदों, सेनानियों पर लागू होते हैं:

उनकी तुरबत पर नहीं है एक भी दीया,

जिनके खूँ से जलते हैं ये चिरागे वतन

जगमगा रहे हैं मकबरे उनके,

बेचा करते थे जो शहीदों के कफन।।

आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश के समस्त संसाधनों पर यही गद्दार मुट्ठी भर लोग कुंडली मार कर बैठे हुए हैं और जनता के एक बड़े हिस्से को दो जून भरपेट रोटी भी नसीब नहीं. आम जनता मंहगाई से त्रस्त है, मिलावट का धंधा जोरों पर है. जिस देश में दूध दही की नदियाँ बहती थी वहाँ कोई भी वस्तु शुद्ध मिलने का भरोसा नहीं.
हमारा देश सोने की चिड़िया था, है और आगे भी रहेगा, लेकिन जरूरत है उसे लुटेरों से बचा कर रखने की.
देश को पहले मुस्लिम आक्रमणकारियों ने लूटा, फिर गोरे अंग्रेजों ने और अब काले अँगरेज़ और उनके चाटुकार लूट रहें हैं. राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन से सम्बंधित विभिन्न घोटाले इसका ताज़ा प्रमाण हैं कि सोने की चिड़िया के पंख किस कदर लूटे जा रहें हैं.
देश के इतिहास पर गौर करें तो ज्यादातर समस्यायें काँग्रेस की गलत नीतियों की देन है, देश के सामने विकराल रूप में खड़ी कश्मीर समस्या भी हमारे देश के अदूरदर्शी भाग्यविधाताओं की देन है.
आज भी देश में तुष्टिकरण की नीति बेधड़क चल रही है. हिन्दू हित की बात करना इस देश में साम्प्रदायिकता कहलाता है. एक चुने हुए जनता के प्रतिनिधि को देश के दूसरे हिस्से में जाने से रोकने का दबाव बनाया जाता है ताकि एक खास वोट बैंक नाराज़ ना हो जाये.
क्या वो समय अभी नहीं आया कि देश का बौद्धिक वर्ग सरकार की भ्रष्ट, चाटुकार, तुष्टिकरण और सीबीआई जैसे साधनों का दुरुपयोग आदि विषयों पर अपनी बात रखे और हर स्तर पर गलत नीतियों का विरोध करे, अगर ऐसा नहीं किया गया तो ये मुट्ठी भर भ्रष्ट लोग हम सबकी जीवन रेखा का आधार भारत रूपी सोने की चिड़िया के पंख तब तक निचोड़ते रहेंगे जब तक उसके प्राण पखेरू उड़ ना जाएँ.
इतना कुछ होने पर भी देश की जनता का बड़ा हिस्सा सो रहा है, याद रखें यह देश हमारा घर है, अपने घर की रक्षा करने कोई विदेशी नहीं आएगा. इसकी रक्षा हमें ही करने होगी. आप लोगों से अनुरोध है कि देश की समस्याओं पर चुप ना बैठे, उठें, खुद जागें और दूसरों को भी जगाएं.
नाविक विद्रोह के सैनिकों को स्वतंत्र भारत की सेना में अग्रकम देना न्यायोचित होता, परन्तु नौकरशाहों ने उन्हें सेना में रखना शासकीय नियमों का उल्लंघन समझा। अनेक क्रांतिकारियों की अस्थियाँ विदेशों में हैं। अनेक क्रांतिकारियों के घर भग्नावशेष हैं। उनके घरों के स्थान पर आलीशान होटल बन गए हैं। क्रांतिकारियों की बची हुई पीढ़ी भी समाप्त हो गई है। निराशा में आशा की किरण यही है कि सामान्य जनता में उनके प्रति सम्मान की थोड़ी-बहुत भावना अभी भी शेष है। उस आगामी पीढ़ी तक इनकी गाथाएँ पहुँचाना हमारा दायित्व है। क्रान्तिकारियों पर लिखने के कुछ प्रयत्न हुए हैं। शचीन्द्रनाथ सान्याल, शिव वर्मा, मन्मथनाथ गुप्त व रामकृष्ण खत्री आदि ने पुस्तकें लिखकर हमें जानकारी देने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इतर लेखकों ने भी इस दिशा में कार्य किया है।

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