सियासी फायदे के लिए सेना को निशाना बनाया जा रहा है!
भारतीय सेना- विश्व की तीसरी सबसे बड़ी सेना है। भारतीय सेना ने अनेकों अद्भुत, अविश्वसनीय और अकल्पनीय कार्य किए हैं, जिसके सम्मान में 'प्रशंसा' जैसा शब्द बहुत छोटा है। भारतीय सेना को किसी सहानुभूति की जरूरत नहीं होती है और ना ही किसी नेता की हमदर्दी। उसे जरूरत है तो बस अपने देशवासियों के प्यार और स्नेह की। भारतीय सेना के प्रमुख आपरेशन्स- आपरेशन पोलो (1948), आपरेशन विजय (1961), द्वितीय कश्मीर युध्द (1965), आपरेशन स्टेपलचेज़ (1971), सिक्किम विलय (1967), सियाचीन मतभेद (1980), आपरेशन ब्लू स्टार (1984), आपरेशन वुडरोज़ (1984), आपरेशन मेघदूत (1984), आपरेशन राजीव (1987), आपरेशन पवन (1987), आपरेशन विराट (1988), आपरेशन त्रिशूल (1988), आपरेशन चेकमेट (1988), आपरेशन कैक्टस (1988), आपरेशन विजय (1999), आपरेशन पराक्रम (2001), आपरेशन ब्लैक टारनैडो (2008), आपरेशन सूर्य होप, (2013), आपरेशन मैत्री (2015)।
ये हैं भारतीय सेना के प्रमुख आपरेशन्स, जिनमें भारतीय सेना ने अपने परिवार और अपनी जान की बाजी लगाकर सिर्फ अपने देशवासियों ही नहीं बल्कि अपने पड़ोसियों की भी मदद की है, जिन्हें कभी भूलाया नहीं जा सकता। लेकिन जरा सोचिए कि यदि इसी सेना पर कोई सरकार 'एफआईआर' कर दे, तो उस सेना पर क्या बीतेगी? अपने परिवार की चिंता छोड़कर जो सेना जिन नागरिकों की सुरक्षा और सुख चैन के लिए दिन रात सरहद पर खड़ी रहती है, दुश्मनों को भारत में प्रवेश करने से रोकती है और उसी के के खिलाफ एफआईआर हो जाए तो उस राक्रमी सेना को कैसा महसूस होगा। ये सरेआम राष्ट्रीयता पर हमला है। हालांकि भारतीय थलसेन के उत्तरी कमाण्ड के प्रमुख 'ले. जनरल देवराज अंबू' ने एफआईआर में नामजद 'मेजर आदित्य' को सेना की तरफ से क्लीनचिट दे दी है और कहा है कि सेना ने कुछ गलत नहीं किया है, उसने आत्मरक्षा में फायरिंग की है।
बहुत दुख हुआ और गुस्सा भी आया ये खबर देखकर कि 27 जनवरी, 2018 को सेना की गोली से दो पत्थरबाजों की मृत्यु के बाद, जम्मू और कश्मीर सरकार ने सेना के एक मेजर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। इस खबर को देखकर, सेना कितनी दुखी हुई होगी कि जिन लोगों के लिए वो देश के शत्रुओं से लड़ने के लिए दिन और रात सीमा पर खड़े होते हैं, वही उनके साथ अन्याय कर रहे हैं। अगर जम्मू में भाजपा एक गठबंधन सरकार है तो इस मुद्दे पर पूरी जवाबदेही भाजपा की ही बनती है कि उन्होनें ऐसा क्यों होने दिया? क्योंकि भाजपा नेता बड़े-बड़े बयान देते हैं कि जो सेना के खिलाफ बोलता है वह एक गद्दार होगा, जो पत्थरबाजों, अलगाववादियों और आतंकवादियों के साथ सहयोग करेगा, वे देशद्रोही होंगे। लेकिन जब उसी की गठबंधन सरकार ने सेना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, तो वे चुप हो गए। क्यों? सिर्फ इसलिए कि यदि एफआईआर के खिलाफ कुछ भी बोला गया, तो सत्ता चली जाएगी? लेकिन भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं ने अभी भी एफआईआर का विरोध किया है। तो अब सवाल उठता है कि जब वे इसका विरोध कर रहे हैं, तको उनके नेता सरकार के कैबिनेट में क्या कर रहे हैं? क्यों दोहरी राजनीति? क्या सेना को आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है? क्या सेना की पास लाठी है कि वे पत्थरबाजों को डंडे से मारकर भगाएं? कुछ पीडीपी नेता कह रहे हैं कि "हम दुखी हैं कि बच्चों (पत्दरबाजों को) को मार दिया गया। सेना ने गलत किया है"। तो महोदय, कृपया यह बताने की कृपा करें कि अगर पत्थरबाजों ने तुम्हे या तुम्हारी महबूबा को पत्थर मारा, तो क्या करोगे? यदि एक पत्थर 'महबूबा मुफ्ती' को किसी ने मारा, तो क्या यह एक बच्चे के रूप में माना जाएगा और छोड़ दिया जाएगा?
सोचने वाली बात ये है कि सेना के खिलाफ इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी विपक्षी पार्टी का कोई नेता सेना का समर्थन नहीं किया बल्कि उल्टे उन नेताओं ने सेना पर ही आरोप लगाने शुरू कर दिए। कैसी विडंबना है कि जिस सेना के हाथ में सिर्फ बंदूक होना चाहिए, उसके हाथ में आज बंदूक के साथ अपनी कारवाई का वीडियो बनाने के लिए कैमरा भी है। इन नेताओं को पत्थरबाजों और आतंकियों का मनावाधिकार तो दिखाई देता है लेकिन उन वीर सैनिकों का मानवाधिर इन नेताओं को क्यों नहीं दिखाई देता? सेना अपने प्रशासनिक काफिले के साथ शांति से जा रही है, और अचानक 200-250 पत्थरबाज उस काफिले पर हमला करते हैं और एक सेना के अधिकारी को खींच कर उसे मारने की कोशिश करते हैं, तो क्या सेना चुप रहती और अपने साथी की हत्या होते देखती रहती? जब सेना से इतनी समस्या है तो साफ साफ ये क्यों नहीं बोल देते कि आप सरहद पर से हट जाओ। हम और हमारी पुलिस पाकिस्तान और आतंकियों से निपट लेंगे। जब बाढ़ आए तो सेना बचाए, लोगों को पत्थरबाजों से सेना बचाए, आतंकियों से सेना बचाए, बाह्य आक्रामण से सेना बचाए, बड़ा हादसा हो जाए तो सेना बचाए और अंत में सेना पर कानूनी कार्रवाई की तैयारी! यह कैसा नियम है? जम्मू-कश्मीर में, सेना ने दो पत्थरबाजों को मार दिया और सेना के इस कार्रवाई से मैं बेहद खुश हूं और इस कार्रवाई के लिए सेना को बधाई देता हूं और भविष्य में यदि कोई ऐसी समस्या पैदा होती है तो सेना इस तरह की कारवाई करने में पीछे ना हटे। मैं इस सवाल को स्पष्ट रूप से बढ़ाता हूं और केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर सरकार को सेना के खिलाफ एफआईआर वापस लेने या पीडीपी समर्थन वापस लेने का अनुरोध करता हूं। क्या सेना के मुकाबले आपको अपनी कुर्सी की ज्यादा चिंता है? 56" की छाती क्यों जम्मू कश्मीर में कम हो जाती है? सत्ता आती रहेगी, जाती रहेगी लेकिन यदि कोई एक बार सेना की नजर में गिर गया तो, फिर से उठने में सक्षम नहीं होगा।
"याद रखो उनकी इन प्यारी मुस्कानों को
इन खुले, सुनसान पहाड़ियों में ये कहीं खो ना जाएं"
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