वामपंथी- एक राष्ट्रविरोधी विचारधारा

 जेएनयू में देशद्रोही नारे लगाए फिर कश्मीर में आतंकवादियों पर कड़ी कार्रवाई से बिलबिलाए वामपंथी पार्थ चटर्जी ने अपने लेख में सेना प्रमुख विपिन रावत की तुलना जलियांवाला बाग के हत्यारे जनरल डायर से करके सेना और पूरे देश का अपमान किया। 

कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी भी भारत को एक देश के तौर पर मान्यता नहीं दी और ना ही कभी स्वयं को भारतीय माना। यही कारण है कि इस पार्टी ने सबसे पहले पाकिस्तान के निर्माण और देश के विभाजन का बकायदा समर्थन किया और पाकिस्तान निर्माण की मांग का पुरजोर समर्थन करते हुए इन्होंने भाषा के आधार पर भारत के 17 टुकड़े करने की मांग उठाई।

       1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय पूरे देश की पीठ में इन वामपंथियों ने छुरा घोंपा और ब्रिटिश सरकार का खुलकर समर्थन किया।

       आज कम्युनिस्टों के दफ्तरों में लोगों को मूर्ख बनाने के लिए लगी महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस की तस्वीरें देखने वाले लोग ये कभी सोच भी नहीं सकती कि इन्हीं वामपंथियों ने कभी 'महात्मा गांधी' को बुर्जुवा तो कभी साम्राज्यवाद का दलाल कहा। इन्होंने 'गांधीजी' की उड़ाई कि उनका लंगोटी धारण करना सिर्फ नौटंकी है।
कम्युनिस्टों ने गांधी को 'खलनायक' और जिन्ना को 'नायक' की उपाधि दे दी थी।
वामपंथियों ने 'नेताजी सुभाष' को कई गालियाँ दीं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज है। कभी 'नेताजी' को तोजो का कुत्ता बताया , तो कभी गद्दार बोस, तो कभी दुश्मन का खरीदा हुआ एजेंट तो कभी राजनीतिक कीड़ा।
'सुभाष जी' की आज़ाद हिन्द फौज के लिए 'काला गिरोह' और 'काटकर फेंकने योग्य सड़ा हुआ अंग' कहा। 
केवल बोस और गाँधी को ही नहीं, बल्कि भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले 'जयप्रकाश नारायण', 'राममनोहर लोहिया', 'अच्युत पटवर्धन' जैसे देशभक्तों पर वामपंथियों ने
'देशद्रोही' का ठप्पा लगाते हुए लगातार स्वतंत्रता सेनानियों और स्वतंत्रता आन्दोलन का अपमान करते रहे। 
कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महामंत्री एस.ए. डांगे वर्षों तक ब्रिटिश गुप्तचर के रूप में कार्य करते रहे और सरकार से मोटा वेतन प्राप्त करते रहे।

24 मार्च, 1943 को भारत के अतिरिक्त गृह सचिव रिचर्ड टोटनहम ने टिप्पणी लिखी कि ''भारतीय कम्युनिस्टों का चरित्र ऐसा कि वे किसी का विरोध तो कर सकते हैं, लेकिन किसी के सगे नहीं हो सकते, सिवाय अपने स्वार्थों के।''

इनके दफ्तरों में 'काॅर्ल मार्क्स' के साथ-साथ रूस के तानाशाह 'जोसफ स्टालिन' की एक तस्वीर जरूर देखने को मिल जाएगी जिसने 400000 (चार लाख) लोगों को मरवाया। यहाँ तक कि अपनी पत्नी को भी मरवा दिया। स्टालिन को आधुनिक युग का शैतान भी कहा जाता है।

         1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो कम्युनिस्ट पार्टी ने बकायदा प्रस्ताव पारित करके इस आजादी को फ्राॅड (धोखे) की संज्ञा दी और उसका देश के पांच राज्यों में सशस्त्र विरोध करके उसे सशस्त्र क्रांति की संज्ञा दी। जो नक्सलवाद के रूप में आज भी भारतीयों के खून की होली खेल रहा है।

          1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया तो कम्युनिस्टों ने उसे हमलावर मानने से इंकार कर दिया और अपने कैडरों को निर्देश दिया कि चीन की मुक्ति वाहनी आ रही है। देशभर में उसका स्वागत किया जाए।
बंगाल में "चीनेर चेयरमैन, आमादेर चेयरमैन" यानी चीन का चेयरमैन, हमारा चेयरमैन के नारे लगाए। 
वामपंथियों ने यह दावा किया कि ‘यह युद्ध नहीं बल्कि, समाजवादी और पूंजीवादी राज्य के बीच का संघर्ष है।’
युद्ध के उस कठिन समय में कम्युनिस्टों ने 'जवाहरलाल नेहरू' की जगह चीन के तानाशाह आक्रमणकारी 'माओत्से तुंग' को भारत का प्रधानमंत्री कहा था। 
कम्युनिस्टों की यही गंदी मानसिकता थी कि भारत पर कब्जा करने के बाद 'माओत्से तुंग' भारत पर कम्युनिस्ट-तानाशाही राज कायम कर सत्‍ता की चाभी उन्‍हें सौंप देंगे।

          कलकत्ता में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बंगाल के सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे 'ज्योति बसु' ने तब चीन का समर्थन करते हुए कहा था– “चीन कभी हमलावर हो ही नहीं सकता (China cannot be the aggressor)”। 
ज्योति बसु के समर्थन में तब सारे वामपंथी एक हो गए थे। सभी कम्युनिस्टों का एक सुर में कहना था कि हमला चीन ने नहीं भारत ने किया है। 
चीन के समर्थन में नारे लगाने वाले उस समय के अधिकांश बड़े वामपंथी नेता शामिल थे।

          चीन के खिलाफ लड़ रही भारतीय सेना की पीठ में छुरा घोंपते हुए वामपंथी श्रमिक संगठनों ने गोला-बारूद और हथियार कारखानों में हड़ताल करवा दी, इसलिए कि भारतीय सैनिकों को हथियार और बारूद की आपूर्ति बुरी तरह रूक जाए और भारतीय सैनिक चीनी सैनिकों के हाथों मार डाले जाएं।
        बंगाल के वामपंथी तो भारत-चीन युद्ध के समय सारी सूचनायें इकठ्ठा कर चीन को सूचित करने में भेदिये की भूमिका निभा रहे थे। 
       उसी दौरान 'Bank of China' की तरफ से भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को 40 लाख रूपये दिये गये। उस समय के हिसाब से इतनी बड़ी राशि क्यों मिली, इसका जवाब आज तक वामपंथी नहीं दे सके। भारत-चीन युद्ध के समय वामपंथियों के इस देशद्रोही कार्य का कुछ वर्ष पहले एक विदेशी खुफिया एजेंसी ने खुलासा भी किया था। 
      आपको जान कर हैरानी होगी कि 1962 के युद्ध के बाद केरल और बंगाल में कई वामपंथी नेताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

      इस युद्ध में भारत की पराजय पर कम्युनिस्टों नें खूब खुशियां मनाई और चीन की कम्युनिस्ट सरकार को बधाई सन्देश भेजा गया कि बधाई हो आपने भारत को हरा दिया।

     जब हम भारत-चीन युद्ध में हार के कारणों पर चर्चा करते हैं तब गद्दार वामपंथियों को भी इस हार के लिए कम कसूरवार नहीं ठहराया जाना चाहिए, जिनकी हमदर्दी भारत में रहने के बादजूद चीनियों के साथ थी। युद्ध के दौरान जिस तरह वामपंथियों ने चीनियों का समर्थन व सहयोग कर अपने ही घर को लुटवाया, वह विश्व इतिहास में देशद्रोह के सबसे शर्मनाक और घिनौने करतूतों में शामिल है।

     बड़ी गलती हुई कि चीन के साथ हुए युद्ध में मिली हार से बुरी तरह टूटने के बावजूद वामपंथी मोह में फंसे नेहरु ने इन देशद्रोहियों को फांसी पर लटकाने के बजाए कुछ समय के लिए जेल में डालने का काम किया।

     भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय यानी 'इंदिरा गांधी' द्वारा लगायी इमरजेंसी का खुलकर कम्युनिस्ट पार्टी ने समर्थन किया था। कम्युनिस्टों ने तब इन्दिरा गांधी के मुखबिर बनकर पूरे देश में इमरजेंसी का विरोध करने वालों को जेल भिजवाया और उन पर हिंसा और जुल्‍म करवाए।

वामपंथियों ने चीन के परमाणु परीक्षण का स्वागत किया लेकिन अपने ही देश भारत के परमाणु परीक्षण का जोरदार विरोध भी किया कि आखिर परमाणु शक्ति के मामले में भारत इनके बाप चीन के बराबर में कैसे बैठ सकता है.. !!

     कश्मीर और देश के अन्य भागों में पाकिस्तान पोषित जिहादी आतंकवाद हो या देश के अनेक राज्यों में खून की होली खेल रहे नक्सलवादी हों, वामपंथी सदा ही उनका समर्थन और पोषण करते आये हैं। 
सी.पी.आई.(माओवादी) ने अपने गुरिल्ला दस्ते का आह्वान
किया है कि वह कश्मीर को 'स्वतंत्र देश' बनाने के संघर्ष में
भाग ले। 
माकपा के प्रमुख अर्थशास्त्री और मंत्री रह चुके 'अशोक मित्र' कह ही चुके हैं,
'लेट गो आफ्फ कश्मीर'-यानी, कश्मीर को जाने दो।

सारे कम्युनिस्ट जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के 'कन्हैया कुमार' की सहायता के लिए खुलकर मैदान में उतरे हुए हैं। वह कश्मीर को भारत का अंग मानने के लिए तैयार नहीं हैं। अब तो उन्होंने खुलेआम यह घोषणा करनी शुरू कर दी है कि कश्मीर पर भारत ने जबरन कब्जा कर रखा है। 

      इन गद्दारों ने सेना पर हमला करने वाले मारे गए आतंकियों को निर्दोष मुसलमान बताया। इन्होने मणिपुर को भी आजाद करने की मांग की। वामपंथी गद्दारों ने कश्मीर की आजादी के लिए कश्मीर के अलगावादियों और आतंकवादियों को समर्थन देने की बात कही और कहा की इसके लिए आंदोलन जारी रहेगा। 
इन गद्दारों के अनुसार सेना रोज कश्मीर के निर्दोष मुसलमानों की हत्या कर रही है। गद्दारों के इस जुलुस में कुछ विश्वविद्यालयों के कई नक्सली वामपंथी गद्दार छात्र छात्राएँ एवं शिक्षक भी शामिल थे।

“कला और राजनीति की असंबद्धता” की दुहाई देते हुए पाकिस्तानी कलाकारों के बैन का विरोध करने वाले ये वही वामपंथी हैं जिन्होंने दिल्ली में आयोजित इंटरनेश्नल आर्ट फेस्टिवल में इस्रायली थिएटर ग्रुप ‘कैमेरी’ के बहिष्कार के लिए ये लिखित दुहाई दी थी की कला को राजनीति से अलग कर के नहीं देखा जा सकता ।

यह दुर्भाग्य की बात है की देश के अधिकांश शिक्षण संस्थान और मीडिया पुरी तरह इन गद्दार वामपंथियों की जकड़ में हैं जिसके कारण छात्र छात्राएँ भी दिग्भ्रमित होकर आतंकवादियों अलगावादियों नक्सलियों और वामपंथियों के समर्थक बन देश से गद्दारी करने लगे हैं। इन संस्थानों को इन गद्दारों से मुक्त कराए बगैर देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता अन्यथा इन संस्थानों में उपस्थित कन्हैया, खालिद, अनिर्बान जैसे गद्दार वामपंथी इन्हीं संस्थानों में बैठकर सैनिकों की शहादत पर जश्न मनाएँगे, आतंकवादियों की मौत पर उनके लिए शोकसभा करेंगे, दुर्गापूजा के समय महिषासुर की पूजा करेंगे। बीफ-पार्टी मनाएँगे, हिन्दू देवी देवताओं की खिल्ली उड़ाएँगे, खुलेआम भारत विरोधी बातें करेंगे और सब कुछ ढर्रे पर चलता रहेगा। 
हम क्या चाहें आजादी, हक हमारा आजादी। कहकर लेंगे आजादी, कश्मीर मांगे आजादी। केरल मांगे आजादी। बस्तर मांगे आजादी। 
भारत मुर्दाबाद। पाकिस्तान जिंदाबाद। .... अफजल गुरु तुम जिंदा हो, हर एक लहू के कतरे में। और अफजल तुमने हमारा सपना साकार किया। जैसे देशद्रोही नारे इन्हीं कम्युनिस्टों की गंदी जुबान से निकल सकता है। 
    
सेना ने गोलीबारी कर अनावश्यक रक्तपात से बचने के लिए कश्मीर में एक जिहादी को जीप से बंधा, और फिर जिहादी को छोड़ भी दिया, पर इसके बाद अब दिल्ली में वामपंथियों और सेकुलरों को भारी आघात लग चुका है, जिससे वामपंथियों को सबसे अधिक दर्द हो रहा है, उनको मानवता, मानवाधिकारों और बाकि हर चीज की याद तेजी से आने लगी है। 
ये तमाम लोग तब चुप थे, एक ट्वीट भी नहीं कर पा रहे थे जब कश्मीरी जिहादी हमारे सैनिको को लात मार रहे थे, गालियां दे रहे थे, मुक्का मार रहे थे, पर जैसे ही देशद्रोहियों पर कारवाही होने लगी दिल्ली ये गद्दार तड़प उठे। 
   
इन्ही कम्युनिस्टों ने भारी खून-खराबे के बाद हिन्दुराष्ट्र नेपाल को बर्बाद करके भारत के विरुद्ध षड्यंत्रों का अड्डा बना दिया है। 

हिंदू और हिंदुस्तान से तो इनकी जन्मजात दुश्मनी जगजाहिर है।
एक ओर तो कम्युनिस्ट धर्मनिरपेक्षता का नकाब ओढ़ते हैं और दूसरी ओर वह जमाते इस्लामी जैसी अतिवादी इस्लामी संगठनों से रिश्ते जोड़ते हैं। धर्म के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण देने की वकालत करते हैं।

इन हिन्दू विरोधियों ने बंगाल और केरल में बांग्लादेशियों और जेहादी आतंकवादियों को भर-भरकर इन राज्यों की धार्मिक एवं जनसांख्यिकी संतुलन को बुरी तरह बिगाड़ दिया एवं सत्ता के लालच में देश से गद्दारी की। 
एक समय था जब वामपंथियों की शह पर बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठिये ऐसे घुसते थे मानों एक कमरे से दूसरे कमरे में जा रहे हों। वे सैकड़ों की संख्या में जत्थे बनाकर भारत में घुसते और वोटबैंक के लालची कम्युनिस्ट उनके राशनकार्ड, वोटर कार्ड व आधारकार्ड बनवाकर बड़ी आसानी से भारत की नागरिकता दिलवाते थे ।परिणामस्वरुप बंग्लादेशी घुसपैठिये बंगाल तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि देश के अन्य भागों में भी फैल गए। आज यही घुसपैठिए बांग्‍लादेशी देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए गम्भीर खतरा चुके हैं। 
एक प्रकार से देखा जाए तो ये वामपंथियों द्वारा भारत राष्ट्र की एकता, अखण्डता और सम्प्रभुता पर पर बहुत ही प्राणघातक हमला था, जिसे देश की जनता कभी क्षमा नहीं करेगी।

ये हर देशभक्त और हिन्दू मान्यता को गाली देते हैं। 
ये वही वामपंथी हैं जो बाबा पशुपतिनाथ मंदिर पर हुए माओवादी हमले का समर्थन कर रहे थे, ये वही वामपंथी हैं जो महान संत लक्ष्मणानंद सरस्वती को आतंकवादी बताते रहे। संत लक्ष्मणानंद की निर्मम हत्या कम्युनिस्टों और ईसाई मिशनरी गठजोड़ का प्रमाण थी।

      चूंकि कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद पराजित हो चुका है, इसलिए हमारे कम्युनिस्टों ने अपनी बची-खुची शक्ति ईसाई एवं इस्लामी साम्राज्यवाद को मदद पहुंचाने एवं हिन्दू धर्म के विरोध में लगा दी है। कम से कम इससे उन्हें अपने शत्रु 'हिन्दुत्व को कमजोर करने का सुख तो मिलता है। इसीलिए भारतीय वामपंथ हर उस झूठ-सच पर कर्कश शोर
मचाता है, जिससे हिन्दू बदनाम हो सकें।
अत: प्रत्येक किस्म के कम्युनिस्ट मूलत: हिन्दू विरोधी हैं। केवल उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रंग में होती है। 
पीपुल्स वार ग्रुप के आंध्र नेता 'रामकृष्ण' ने कहा ही था कि 'हिन्दू धर्म को खत्म कर देने से ही हरेक समस्या सुलझेगी।' अन्य कम्युनिस्टों को भी इस बयान से कोई आपत्ति नहीं है।
हिन्दू धर्म के धुर विरोधी वामपंथी हमेशा से ही वंचितों, वनवासियों का संगठित व अवैध धर्मान्तरण कराने का उग्र
बचाव करते हैं।

वामपंथियों ने भारतवर्ष के प्राचीन गौरवशाली इतिहास को भी बुरी तरह विकृत कर दिया है जिसे आज भी हमारे छात्र स्कूलों, काॅलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं। 
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सन 1971 में कांग्रेस के विभाजन के पश्चात कम्युनिस्टों से समझौता किया और कट्टर वामपंथी विचारधारा वाले डा. नूरूल हसन को केन्द्रीय शिक्षा राज्यमंत्री पद सौंपा।
बस मौका मिलते ही डा. हसन ने तुरंत कांग्रेस सरकार को ढाल बनाकर वामपंथी इतिहासकारों-लेखकों को एकत्रित किया और प्राचीन हिन्दू इतिहास तथा पाठय पुस्तकों के विकृतिकरण का बीड़ा उठा लिया।
ये सभी नकली इतिहासकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की उपज थे तथा घोर हिन्दू धर्मविरोधी थे। तमाम शिक्षण अकादमियों में कम्युनिस्ट भर दिये गये। इसका नतीजा ये हुआ कि इन सभी ने भारत का पूरा इतिहास ही विकृत कर डाला। 
सुविख्यात इतिहासकार यदुनाथ सरकार, रमेश चंद्र मजूमदार तथा श्री जीएस सरदेसाई जैसे सुप्रतिष्ठित इतिहासकारों के लिखे ग्रंथों को नकार कर नये सिरे से इतिहास लेखन का कार्य शुरू कराया गया और घोषणा की गई कि इतिहास और पाठ्यपुस्तकों से वे अंश हटा दिये जाएंगे जो राष्ट्रीय एकता में बाधा डालने वाले और मुसलमानों की भावना को ठेस पहुँचाने वाले लगते हैं।
कट्टर वामपंथी डा. नूरूल हसन ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भाषण करते हुए कहा- महमूद गजनवी, औरंगजेब आदि मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दुओं के नरसंहार एवं मंदिरों को तोड़ने के प्रसंग राष्ट्रीय एकता में बाधक है, अत: उन्हें नही पढ़ाया जाना चाहिए।
वामपंथी इतिहासकारों और लेखकों ने मुस्लिम-शासकों द्वारा द्वारा धर्म के नाम पर काफ़िर हिन्दुओं के ऊपर किये गये भयानक अत्याचारों को गायब कर दिया है। 
वामपंथी इतिहासकारों की दृष्टि में स्कूल के बच्चों को यह पढ़ाना बहुत आवश्यक लगता है कि आर्य बाहर से आये थे और वैदिककाल में गोमांस खाया जाता था जबकि वैदिक साहित्य में गौ को "अघन्या' कहा गया है।
इन्होंने मुगल शासक अकबर, औरंगजेब आदि आक्रमणकारियों को विशुद्ध राष्ट्रवादी और महान शासक बताकर पहली श्रेणी में रखा तथा महाराणा प्रताप, शिवाजी जैसे देश के रक्षकों को बहुत सीमित अर्थों में केवल नाममात्र के लिए राष्ट्रवादी कहकर दूसरी श्रेणी में रखा।
वामपंथी इतिहासकारों और लेखकों के गैंग ने मुगल साम्राज्य की सफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया, परन्तु साथ ही उन्होंने मुगल शासकों की असफलताओं, कमियों तथा हिन्दुओं पर किये गये अमानुषिक अत्याचारों द्वारा धर्मान्तरण को बिल्कुल छिपा लिया।
वामपंथी इतिहासकार औरंगजेब की तुलना में शिवाजी को राष्ट्रीय मानने को तैयार नहीं हैं। उनके संघर्ष को देश के साथ जोड़ने में उन्हें लज्जा आती है। 
एनसीआरटी द्वारा प्रकाशित ‘मध्यकालीन भारत’ तथा ‘उत्तर मुगलकालीन भारत’ पुस्तकों में वामपंथी लेखक डा. सतीश चंद्र ने कलम और तलवार के धनी महान भारतीय गुरू गोविंद सिंह जी महाराज पर औरंगजेब से माफी मांगने जैसा निराधार आरोप लगाने की धृष्टता की थी।
कुल मिलाकर वामपंथी इतिहासकारों और लेखकों के गिरोह ने मध्यकालीन भारत का सम्पूर्ण सच्चा इतिहास कभी भी जनता के सामने नहीं आने दिया गया।

भारतीय कम्युनिष्टों को धर्म, विशेषकर हिंदू धर्म से बहुत एलर्जी रही है। अन्य किसी संप्रदाय से इन्हें कुछ भी लेना-देना नहीं रहा। दूसरी तरफ न जाने क्यूं इन्हें जातिवादी राजनीति में कोई ऐब नजर नहीं आता ? लालू, मायावती या कोई और जातीय गुट चाहे कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो, के साथ हाथ मिलाने में इन्हें जरा भी झिझक नहीं होती। शर्त केवल एक ही है कि वो हिंदूवादी नहीं होना चाहिए बल्कि इसका विरोधी होना चाहिए।

इसीलिए भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को ये अपना जानी दुश्मन मानते हैं।
देश के सबसे बड़े साम्यवादी संगठन के नेता कामरेड
प्रकाश करात ने अपनी पार्टी के मुखपत्र पीपुल्स डेमोक्रेसी के एक अंक में लिखा था कि देश की कारपोरेट मीडीया, संयुक्त राज्य अमेरिका, दुनिया के हथियार ऐजेंट और आरएसएस की मिलीभगत के कारण चीन के साथ भारत का गतिरोध दिखाई दे रहा है, जबकि वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं था।
'करात' के उस आलेख का कुल सारांश है कि चीन तो भारत
का सच्चा दोस्त है लेकिन आरएसएस के लोग देश के
जानी दुश्मन है।
वामपंथियों के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में आरएसएस चिन्हित है। 
केरल में, आंध्र प्रदेश में, उड़ीसा में, बिहार और झारखंड में,
छत्तीसगढ़ में, त्रिपुरा में यानी जहाँ भी साम्यवादी हावी होते हैं वहीं इनके टारगेट में राष्ट्रवादी होते हैं और आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या इनके एजेंडे में शमिल है।

केवल एक आरएसएस ही नहीं, वामपंथियों ने बंगाल में सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की संख्या में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत विपक्षी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बेरहमी से मार डाला। इनमें तापसी मल्लिक की नृशंस बलात्कार एवं हत्या से लेकर सेनबाड़ी में कांग्रेस कार्यकर्ता के छोटे बच्चों को जिंदा आग में फेंकने और सगे बेटों के खून से सना चावल उनकी माँ को जबरदस्ती खिलाने वाली हृदयविदारक घटना और विरोधी दलों के सैकड़ों लोगों को मारकर जमीन में दफन करने की अमानवीय घटनाएँ भी शामिल हैं। जिसके बाद सरकार बदलने पर जमीन खोद-खोदकर बड़ी संख्या में नरकंकाल निकाले जाते रहे।
बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस कांग्रेस की छत्रछाया में ये वामपंथी दशकों तक फलते-फूलते रहे, अपने शासित राज्यों में इन्होंने उसी पार्टी के कार्यकर्ताओं की जघन्य हत्याएँ की। बंगाल में CPM-CONGRESS संघर्षों की खूनी घटनाएँ याद करके आज भी लोग सिहर उठते हैं। 
वामपंथियों के खूनी खेल को बंगाल के बच्चे-बच्चे ने अपनी आँखों से देखा।
नंदीग्राम में कितनी महिलाओं से बलात्कार किया गया यह भी मालूम नहीं पड़ेगा, कितने बम चले इनकी गिनती ही नहीं। कितने लोग मारे गए, कितने शव नदी में फेंक दिये, कोई नहीं जानता। असंख्य ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें आज भी पता नहीं कि उनके घर के पुरूष कहां हैं ?

कांग्रेस राज में प्रिंट एवं न्यूज मीडिया में अधिकाँश स्थानों पर इनके तैयार किये हुए विषैले पत्रकार बहुत ताकतवर बनकर बैठे थे, इसीलिए इनकी असलियत साधारण जनता तक बहुत कम ही पहुँच पाती थी। 
हालांकि अभी भी न्यूज एवं प्रिंट मीडिया पर वाम समर्थक बड़ी संख्या में काबिज हैं इसलिए वह अभी तक देश की जनता की आंखों में धूल झोंककर उन्हें मूर्ख बना पा रहे हैं।(जैसे बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, विनोद दुआ, प्रणव राय ...आदि आदि)

आंदोलन के नाम पर देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियां चलाने का कार्य जिनमें तिरंगे का अपमान करना, लोकतंत्र व्यवस्था को उखाड़ने का प्रयास तथा राष्ट्रद्रोही याकूब मेनन जैसे लोगों का समर्थन करना वामपंथियों का ध्येय बन गया है। इन वामपंथियों ने याकूब की फांसी का विरोध ही नही किया, बल्कि इन्होनें उसके द्वारा की गई राष्ट्रद्रोही गतिविधियों का समर्थन किया। 
    
कम्युनिस्ट पार्टी रूस से और चीन की मार्क्सवादी पार्टी से नियमित रूप से आर्थिक सहायता प्राप्त करती रही।
विशेषकर सोवियत संघ रूस के बिखरने से वामपंथ और वामपंथी मिटने के कगार पर आ गये, क्योंकि आज न तो इन्हें वामपंथी देशों से दाना-पानी चलाने को पैसा मिल रहा है और न ही राजनीतिक समर्थन। फिर भी भारत विरोध के इनके इरादे कमजोर नहीं पड़े हैं।

आज के समय में ये जल-जंगल-जमीन की लडाई के नाम पर भारत के प्राकृतिक संसाधन पर कब्ज़ा ज़माने और भारत के लोकतान्त्रिक ढांचे को ख़त्म करने का लगातार षड्यंत्र रच रहे है। 
भारत विरोधी सारे संगठनों के गिरोह के तार उन्ही लोगो से जुड़े है जो आज़ादी से पहले अंग्रेजो का और आज़ादी के बाद भारत विरोधियों का साथ देते रहे है। 
इनके इरादे आज भी देश की सरकार को उखाड़कर, भारत की संस्कृति-सभ्यता को मटियामेट करने व भारत नाम के देश का अस्तित्व मिटने का ही है। मानवाधिकारों की लडाई लड़ने का ढोंग रचने वालें भारतीय वामपंथी आज भी नक्सलियों और माओवादियों के द्वारा जब निर्दोष लोग मारे जाते है, तब इनके मुंह से एक शब्द सुनाई नहीं पड़ते। जब चीन अरूणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता है, तब भी वे चुप ही रहते है।

केवल भारत ही नहीं दुनियाँ का इतिहास साक्षी है कि वामपंथी विचारधारा ने जिस भी देश को छुआ, उसे राजनीतिक रूप से ही लाल नहीं किया, अपितु वहां की सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को भी लाल कर दिया। 
तथाकथित अहिंसक 'बोल्शेविक' क्रांति के बाद का रूसी इतिहास वास्तव में शवों एवं कब्रिस्तानों का इतिहास रहा। 
आने वाले 3 वर्ष तक रूस में गृह युद्ध चलता रहा। उस समय साम्यवाद का विरोध करने वालों से निपटने के लिए 'लेनिन' ने रेड-आर्मी और कुख्यात एवं क्रूर खूफिया पुलिस 'चेका' का गठन किया। 'लेनिन' ने सभी "क्रांति विरोधियों" को गोली मार देने के निर्देश जारी किए। दसियों हजार नागरिक यातनाएं देकर मौत के घाट उतार दिए गए।

प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार 'मैक्सिम गोर्की' ने 'लेनिन' के इस आतंकराज का वर्णन करते हुए लिखा है, 'लोगों को बाएं हाथ और बाएं पैर में कीलें ठोककर पेड़ों पर टांग दिया जाता था। 
कम्युनिस्ट कार्यकर्ता 'क्रांति-विरोधियों' को पकड़कर उनके पेट में चीरा लगाते, फिर आंत को थोड़ा बाहर निकालकर कीलों से पेड़ में ठोक देते। फिर उस व्यक्ति को मार-मार कर पेड़ के चारों तरफ घूमाते ताकि आंतें पेट में से निकलकर पेड़ के चारों तरफ लिपट जाएं।' लेनिन के बोल्शेविक शासन को मान्यता न देने वाले शहर, कस्बे और गांव के गांव जला डाले गए।
रूस में जब कम्युनिज्म आया था तब रूसी ग्रामीण पेट भरने लायक अन्न उपजा रहे थे। 
लेकिन 1918 में 'लेनिन' ने निजी संपत्ति की समाप्ति की घोषणा कर दी। खुफिया पुलिस 'चेका' के अधिकारी गांव-गांव में जाकर, बंदूक की नोंक पर पशु और अनाज छीन कर लाने लगे। विरोध करने वालों को मौत के घाट उतार दिया जाता। लाभ की आशा खत्म हो जाने से तंग आकर रूसी किसानों ने केवल अपने खाने लायक अनाज बोया। फलस्वरूप 1920 तक रूस का अन्न उत्पादन 74 मिलियन टन से घटकर 20 मिलियन टन पर आ गया। लेनिन ने इसे किसानों का क्रांति विरोधी षड्यंत्र माना और बहुत सारे इलाकों में किसानों से अन्न का एक-एक दाना छीनकर परिवार सहित भूखों मरने को छोड़ दिया। जिससे 5 लाख लोग भूख के कारण तड़पकर मर गए। 
इस भयंकर मानव त्रासदी को कम्युनिस्ट क्रांति के लिए शुभ बताते हुए लेनिन ने 19 मार्च, 1922 को पोलित ब्यूरो को लिखा-
'वर्तमान परिस्थिति हमारे लिए लाभप्रद है। जो लोग भूख से मर रहे हैं, जिन्होंने भूख के कारण एक-दूसरे को ही खाना शुरू कर दिया है, जो लाखों की संख्या में मर रहे हैं, और जिनकी लाशें देशभर में सड़कों के किनारे सड़ रही हैं उनकी मदद से हम चर्च की संपत्ति छीन लेंगे। इस अकाल के कारण लोगों में व्याप्त निराशा हमारी एकमात्र आशा है जिसके कारण वे हमें आशा से देखेंगे।'

लेनिन की मौत के बाद 1924 में जोसफ स्टालिन के हाथ सत्ता आई। स्टालिन ने लेनिन को भी पीछे छोड़ते हुए आतंक के इस साम्राज्य को अभूतपूर्व ऊंचाइयां दीं तथा कम्युनिस्ट क्रांति के नाम पर लाखों रूसी श्रमिकों और किसानों को मौत के घाट उतार डाला। आने वाले वर्षों में यही कहानी कम्युनिस्ट चीन सहित दूसरे कई देशों में दुहराई गई।

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  1. कोई स्रोत बताय बसु के बयान का कोई किताब लिंक

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