विद्यालयों मे भी हिन्दू-मुसलमान!

सच में आज मैं बहुत दुखी हुआ। यह सुनकर कि इस देश की सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका डाली गई जिसमें ये कहा गया कि केंद्रीय विद्यालयों में जो प्रार्थना होती है, उससे धर्म विशेष को फायदा पहुंचता है और बच्चों के वैज्ञानिक स्वभाव पर असर पड़ता है। छात्रों को कोई समस्या नहीं है, सिर्फ कुछ तथाकथित सेक्यूलरों को समस्या है।
प्रार्थना है-
                   "असतो मा सद्गमय
                   तमसो मा ज्योतिर्गमय
                   मृत्योर्मामृतं गमय"।
इस प्रार्थना की आखिरी लाइन है-
                        "ओम् सहनाववतु
                            सहनै भुनवक्तु
                       तेजस्वीनामवधीतमस्तु
                            मा विद्विषावहै"
इसका अर्थ यह होता है-
  'हे ईश्वर! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो'।
अब मुझे ये समझ में नहीं आता कि इस प्रार्थना से किस धर्म को बढावा मिलता है। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि गैर-हिन्दू छात्रों को धूप में हाथ जोड़कर खड़ा कराया जाता है, वो परेशान होते हैं। ये प्रार्थना उन छात्रों पर थोपा जाता है। अब मुझे ये नहीं पता कि जब उन विद्यालयों में पढने वाले छात्रों को लेकर इससे कोई समस्या नहीं है तो फिर बाकी(याचिकाकर्ता डालने वाला व्यक्ति और उसकी वकील) लोगों को इससे समस्या क्यों है? उन छात्रों ने कभी ऐसी कोई शिकायत ही नहीं की तो ये क्यों ना समझा जाए कि इस याचिकाकर्ता और इसके वकील ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए मासूमों को भी हिन्दू-मुसलमान बना दिया। वकील का कहना है कि मैंने इसे हिन्दू-मुसलमान नहीं बनाया बल्कि मीडिया ने बनाया गया और फिर ये वकील वही दलील दे रही हैं जो हिन्दू-मुसलमान करता है। लगभग 54 सालों से केंद्रीय विद्यालय इस देश में संचालित हो रहे हैं और इतने दिन से यही प्रार्थना हो रही है, लेकिन आजतक ऐसी कोई आपत्ति किसी की तरफ से नहीं आई तो अब क्यों आई? क्या पहले इन विद्यालयों में मुस्लिम/ईसाई/सिखों के बच्चे नहीं पढते थे? इस देश की न्यायालयों में लगभग 3 करोड़ मामले लंबित हैं, लेकिन इस याचिका पर तुरंत फैसला आ गया। 70 वर्ष से राम मंदिर का मामला लंबित है, 27 वर्ष से कश्मीरी पंडितों, 16 दिसंबर,2012 को दिल्ली में हुए दर्दनाक निर्भया कांड का फैसला आने में 5 साल लग गये, एक विवाहिता को सिर्फ दहेज के लिए जलाकर मारने के मामले पर फैसला आने में वर्षों बीत जाते हैं, फिर भी न्याय नहीं मिलता। कश्मीरी पंडितों के लिए कई बार याचिका पड़ा लेकिन माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया। पिछले महीनों कुछ आतंकवादी पकड़े गये और उनका जुड़ाव मदरसों से लगे होने का पता चला, लेकिन वकील साहिबा ने इस पर याचिका नहीं डाली। हिंदूओं को टार्गेट करना बहुत आसान है, लेकिन इस्लाम या ईसाई धर्म पर सवाल उठाने की हिम्मत नहीं है। नफरत का जहर वकील साहिबा ने घोल दिया और अब दलील दे रही हैं कि मैंने नहीं बल्कि मीडिया ने हिंदू-मुस्लिम बनाया। ये प्रार्थना बंद हो जाने के बाद 'एल.के.जी.-यू.के.जी'. में पढने वाले बच्चे जब विद्यालय जाएंगे और उन्हें इस बात का पता चलेगा और वो अपने अध्यापक से इस बात का जवाब पूछेंगे तो उन्हें क्या जवाब दिया जाएगा? कि मीडिया ने बंद करवा दिया? भगवान के लिए कम से कम विद्यालयों को इन मामलों में ना घसीटा जाए। न्यायालय की तरफ से केंद्र सरकार से मामले पर चार हफ्ते में जवाब मांगा गया है। उम्मीद है केंद्र सरकार सकारात्मक जवाब देगी।
       आखिरी में मैं यही कहूंगा कि विद्यालय को हिंदू-मुसलमान में मत बांटिए। विद्यालय में हर वर्ग, हर धर्म के बच्चे पढते हैं और किसी को इससे समस्या नहीं है, सिवाय तथाकथित सेक्यूलरों के।
कृपया, इसे शिक्षा का मंदिर ही रहने दीजिए।
धन्यवाद,

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